लाल ललित ललितादिक संग लिये

(उत्सव भोग आये तब)
लाल ललित ललितादिक संग लिये बिहरत वर वसन्त ऋतु कला सुजान।
फूलन की कर गेंदुक लिये पटकत पट उरज छिये हसत लसत हिलि मिलि सब सकल गुन निधान॥१॥
खेलत अति रस जो रह्यो रसना नहिं जात कह्यो निरखि परखि थकित भये सघन गगन जान।
छित स्वामी गिरिवरधर विट्ठल पद पद्म रेनु वर प्रताप महिमा ते कियो कीरति गान॥२॥

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