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हिंडोरेतें उतरे लाल विहारी
हिंडोरेतें उतरे लाल विहारी |
रमकनि ठमकनि उतरि राधिका कोटि चंद उजियारी || १ ||
गोपीजन सब पाय परत हैं राई लोन उतारी |
कर मुरली ले बेनु बजावत गोकुल चले हैं मुरारी || २ ||
जैजैकार ब्रह्मादिक बोले पुष्पन-वृष्टि कराई |
परमानंददास को ठाकुर व्रजजन के सुखदाई || ३ ||
रमकनि ठमकनि उतरि राधिका कोटि चंद उजियारी || १ ||
गोपीजन सब पाय परत हैं राई लोन उतारी |
कर मुरली ले बेनु बजावत गोकुल चले हैं मुरारी || २ ||
जैजैकार ब्रह्मादिक बोले पुष्पन-वृष्टि कराई |
परमानंददास को ठाकुर व्रजजन के सुखदाई || ३ ||
जागो मेरे लाल जगत उजियारे
जागो मेरे लाल जगत उजियारे ।
कोटिक मनमथ वारों मुसकनि पर कमल नयन अंखियन के तारे ॥१॥
संगले ग्वालबाल बछ सब संग लेउ जमुना जी के तट पर जाउ सवारे ।
परमानंद कहत नंदरानी दूर जिन जाउ मेरे ब्रज के रखवारे ॥२॥
कोटिक मनमथ वारों मुसकनि पर कमल नयन अंखियन के तारे ॥१॥
संगले ग्वालबाल बछ सब संग लेउ जमुना जी के तट पर जाउ सवारे ।
परमानंद कहत नंदरानी दूर जिन जाउ मेरे ब्रज के रखवारे ॥२॥
यह धन धर्म ही तें पायो
यह धन धर्म ही तें पायो।
नीके राखि जसोदा मैया नारायण ब्रज आयो॥१॥
जा धन को मुनि जप तप खोजत वेदहुं पार न पायो।
सों धन धर्यो क्षीर सागर में ब्रह्मा जाय जगायो॥२॥
जा धन तें गोकुल सुख लहियत, सगरे काज संवारे।
सो धन वार वार उर अंतर, परमानंद विचारे॥३॥
जा धन तें गोकुल सुख लहियत, सगरे काज संवारे।
सो धन वार वार उर अंतर, परमानंद विचारे॥३॥
कमल मुख देखत, तृप्त ना होय
कमल मुख देखत, तृप्त ना होय ।
यह सुख कहा दुहागीन जाने, रही निसाभर सोय ॥ १॥
ज्यों चकोर चाहत उडुराजे, चंद वदन रही जोय ।
नेक अकोर देत नही राधा, चाहत पीयरी निचोय ॥ २॥
उन् तो अपनों सर्वस्व दीनो, एक प्राण वपु दोय ।
भजन भेद न्यारो परमानन्द, जानत विरला कोय ॥ ३॥
यह सुख कहा दुहागीन जाने, रही निसाभर सोय ॥ १॥
ज्यों चकोर चाहत उडुराजे, चंद वदन रही जोय ।
नेक अकोर देत नही राधा, चाहत पीयरी निचोय ॥ २॥
उन् तो अपनों सर्वस्व दीनो, एक प्राण वपु दोय ।
भजन भेद न्यारो परमानन्द, जानत विरला कोय ॥ ३॥
श्याम कहा चाहतसे डोलत
श्याम कहा चाहतसे डोलत ।
बूजे हुते वदन दूरावत , सुधे बोल ना बोलत ॥१॥
सुने निपट अंधीयारे मंदिर, दधी भाजनमें हाथ ।
अब काहे तुम उत्तर कर हो, कोऊ संग ना साथ ॥२॥
मैं जान्यो यह मेरो घर है , तिही धोखे में आयो ।
देखतही गोरस में चेंटी , काढ्नको कर नायो ॥३॥
सुनत चतुर वचन मोहनके , ग्वालिनी मूर मुस्कानी ।
परमानंद्प्रभू हो रतीनागर , सबे बात हम जानी ॥४॥
बूजे हुते वदन दूरावत , सुधे बोल ना बोलत ॥१॥
सुने निपट अंधीयारे मंदिर, दधी भाजनमें हाथ ।
अब काहे तुम उत्तर कर हो, कोऊ संग ना साथ ॥२॥
मैं जान्यो यह मेरो घर है , तिही धोखे में आयो ।
देखतही गोरस में चेंटी , काढ्नको कर नायो ॥३॥
सुनत चतुर वचन मोहनके , ग्वालिनी मूर मुस्कानी ।
परमानंद्प्रभू हो रतीनागर , सबे बात हम जानी ॥४॥
वारि मेरे लटकन पग धरो छतियाँ
वारि मेरे लटकन पग धरो छतियाँ ।
कमलनयन बलि जाऊ वदनकी,
शोभित नेन्ही नेन्ही दूधकी द्वे दतियाँ॥१॥
यह मेरी यह तेरी यह बाबा नन्दजूकी,
यह बलभद्र भैया की।
यह ताकि जो झूलावे तेरो पलना॥
ईंहां ते चली खुर खात पीवत जल,
परिहरो रुदन हसो मेरे ललना॥२॥
रुनक झूनक बाजत पैजनियाँ,
अलबल कलबल, बोलो मृदु बनियाँ।
परमानंद प्रभु त्रिभुवन ठाकुर,
जाय झूलावे बाबा नंद्जू की रनियाँ॥३॥
कमलनयन बलि जाऊ वदनकी,
शोभित नेन्ही नेन्ही दूधकी द्वे दतियाँ॥१॥
यह मेरी यह तेरी यह बाबा नन्दजूकी,
यह बलभद्र भैया की।
यह ताकि जो झूलावे तेरो पलना॥
ईंहां ते चली खुर खात पीवत जल,
परिहरो रुदन हसो मेरे ललना॥२॥
रुनक झूनक बाजत पैजनियाँ,
अलबल कलबल, बोलो मृदु बनियाँ।
परमानंद प्रभु त्रिभुवन ठाकुर,
जाय झूलावे बाबा नंद्जू की रनियाँ॥३॥
कहन लागे मोहन मैया मैया
कहन लागे मोहन मैया मैया।
बावा बावा नंदरायसो,
अरु हलधरसो भैया भैया॥१॥
छगन मगन मधुसुदन माधो,
सब व्रज लेत बलैया।
नाचत मोर रहत संग उनके,
तोतरे बोल बुलैया॥२॥
दुरी खेलन जिन जाऊ मनोहर,
मारेगी कहुकी गैया।
मात यशोदा ठाड़ी टेरे,
ले ले नाम कन्हैया॥३॥
सब गोकुलमें आनंद उपज्यो,
घर घर होत बधैया।
नंदनंदंकी या छबि ऊपर,
परमानंद बलि जैया॥४॥
बावा बावा नंदरायसो,
अरु हलधरसो भैया भैया॥१॥
छगन मगन मधुसुदन माधो,
सब व्रज लेत बलैया।
नाचत मोर रहत संग उनके,
तोतरे बोल बुलैया॥२॥
दुरी खेलन जिन जाऊ मनोहर,
मारेगी कहुकी गैया।
मात यशोदा ठाड़ी टेरे,
ले ले नाम कन्हैया॥३॥
सब गोकुलमें आनंद उपज्यो,
घर घर होत बधैया।
नंदनंदंकी या छबि ऊपर,
परमानंद बलि जैया॥४॥
पवित्रा पहरे परमानंद
पवित्रा पहरे परमानंद।
श्रावन सुदी एकादशी के दिन,
गिरिधर परमानंद॥१॥
श्री वृषभाननंदिनी निजकर,
ग्रथित विविध पटभांत।
ता मध्य सुभग सुवर्ण सुत्रसो,
पोई नवमती जात॥२॥
पवित्रा पहरे हिंडोरे जुलत,
दोउ आनंद कंद।
जमुना पुलिनमें कुंज मनोहर,
गावत परमानंद॥३॥
श्रावन सुदी एकादशी के दिन,
गिरिधर परमानंद॥१॥
श्री वृषभाननंदिनी निजकर,
ग्रथित विविध पटभांत।
ता मध्य सुभग सुवर्ण सुत्रसो,
पोई नवमती जात॥२॥
पवित्रा पहरे हिंडोरे जुलत,
दोउ आनंद कंद।
जमुना पुलिनमें कुंज मनोहर,
गावत परमानंद॥३॥
આજ દિવારી મંગલ ચાર
આજ દિવારી મંગલ ચાર |
વ્રજ યુવતી મિલ મંગલ ગાવત ચોક પુરાવત આંગન દ્વાર || ૧ ||
મધુ મેવા પકવાન મીઠાઈ ભરી ભરી લીને કંચન થાર |
પરમાનંદદાસકો ઠાકુર પહેરે આભૂષણ સિંગાર || ૨ ||
અબ મોય સોવન દેરી માય
ગોપાષ્ટ્મીનું પદપોઢવાનું
અબ મોય સોવન દેરી માય |
ગાયનકે સંગ ફિરત બનબન મેરે પાંય પિરાય || ૧ ||
આજ સાંજ હી તેં નીંદ મેરે નયન પેઠી આય |
ખુલત નાહીન પલક મેરી ખાયો કછુઅન જાય || ૨ ||
કર કલેઉ પ્રાત જેહોં ફેર ચરાવન ગાય |
પરમાનંદ પ્રભુકી જનની લેત કંઠ લપટાય || ૩ || પ્રથમ ગોચરન ચલે કન્હાઈ
પ્રથમ ગોચારન ચલે કન્હાઈ |
માથે મુકુટ પીતામ્બરકી છબી વનમાલા પહરાઈ || ૧ ||
કુંડલ શ્રવણ કપોલ બિરાજત સુંદરતા બનિ આઈ |
ઘરઘરતે સબ છાક લેત હૈ સંગ સખા સુખદાઈ || ૨ ||
આગે ધેનુ હાંક સબ લીની પાછે મુરલી બજાઈ |
પરમાનંદ પ્રભુ મનમોહન બ્રજબાસીન સુરત કરાઈ || ૩ ||
સજનીરી ગાવો મંગલ ચાર
બ્યાહ અને શેહરાનું પદ
સજનીરી ગાવો મંગલ ચાર |
ચિરજીયો વૃષભાન નંદિની દુલ્હે નંદકુમાર || ૧ ||
મોહનકે શિર મુકુટ બિરાજત રાધાકે ઉર હાર |
નીલામ્બર પીતામ્બરકી છબી શોભા અમિત અપાર || ૨ ||
મંડપ છાયો દેખ બરસાને બેઠે નંદ ઉદાર |
ભામર લેત પ્રિયા ઔર પ્રીતમ તનમન દીજે વાર || ૩ ||
યહ જોરી અવિચલ શ્રી વૃંદાવન ક્રીડત કરત વિહાર |
પરમાનંદ મનોરથ પૂરન ભક્તન પ્રાણ આધાર || ૪ ||
आज ललनकी होत सगाई
ब्याह और शेहराका पद
आज ललनकी होत सगाई |
आवोरी गोपीजन मिलकें गावो मंगल चार बधाई || १ ||
चोटी चुपर गुहूँ सूत तेरी छान्ड़ो चंचलताई |
वृषभान गोप टीको दे पठ्यो सुन्दरजान कन्हाई || २ ||
जो तुमको या भान्त देख है कर हैं कहा बड़ाई |
पहर बसन आभूषण सुन्दर उनको देऊ दिखाई || ३ ||
नखशिख अंग शृंगार महार मन मोतिनकी माला पहराई |
बैठे आय रत्न चौकी पर नारिनकी भीर सुहाई || ४ ||
विप्र प्रवीण तिलक कर मस्तक अक्षत चांप लियो अपनाई |
बाजत ढोल भेर और महुवर नोबत ध्वनि घनघोर बजाई || ५ ||
फूली फिरत यशोदारानी वार कुंवर पर वसन लुटाई |
परमानन्द नन्दके आंगन अमरगण पोहोपन झरलाई || ६ ||
देव दिवारी शुभ एकादशी...
देव दिवारी शुभ एकादशी हरि प्रबोध किजेहो आज |
निद्रा तजो उठो हो गोविन्द सकल विश्वहित काज || १ ||
घरघर मंगल होत सबनके ठोरठोर गावत व्रजनारी |
परमानंद दासको ठाकुर भक्त हेत लीला अवतारी || २ ||
मैया मोहि ऐसी दुल्हनि भावै
मैया मोहि ऐसी दुल्हनि भावै |
जैसी ये काहूकी डिठोनिया रुनक झुनक घर आवे || १ ||
करकर पाक रसाल रसोई अपने कर ले मोहि जिमावे |
कर अंचल पट ओट बाबाको ठाढ़ी ब्यार ढुरावे || २ ||
मोहि उठाय गोद बैठारे कर मनुहार मनावे |
अहो मेरे लाल कहो बावासों तेरो ब्याह करावे || ३ ||
नंदराय नंदरानी हिलमिल सुख समुद्र बढावे |
परमानन्द प्रभुकी बातें सुन आनंद उर न समावे || ४ ||
सखीरी लोभी मेरे नयन
सखीरी लोभी मेरे नयन |
बिन देखें चटपटी लागत देखत उपजे चेन || १ ||
मोर मुकुट काछें पीताम्बर सुन्दरता के एन |
अंगअंग छबि कही न परत है निरख थकित भयोमेन || २ ||
मुरली ऐसी लागत श्रवणन चितवत खग मृग धेन |
परमानन्द प्रेमीके ठाकुर वे देखो ठाढ़े एन || ३ ||
बिन देखें चटपटी लागत देखत उपजे चेन || १ ||
मोर मुकुट काछें पीताम्बर सुन्दरता के एन |
अंगअंग छबि कही न परत है निरख थकित भयोमेन || २ ||
मुरली ऐसी लागत श्रवणन चितवत खग मृग धेन |
परमानन्द प्रेमीके ठाकुर वे देखो ठाढ़े एन || ३ ||
मेरो माई हरि नागर सों नेह
मेरो माई हरि नागर सों नेह |
जबते द्रष्टि परे मनमोहन तबते विसरयो गेह || १ ||
कोऊ नींदों कोऊ वंदो मो मन गयो संदेह |
सरिता सिन्धु मिली परमानन्द भयो एकरस तेह || २ ||
जबते द्रष्टि परे मनमोहन तबते विसरयो गेह || १ ||
कोऊ नींदों कोऊ वंदो मो मन गयो संदेह |
सरिता सिन्धु मिली परमानन्द भयो एकरस तेह || २ ||
चलरी सखी नंदगाम जाय वसिये
चलरी सखी नंदगाम जाय वसिये |
खिरक खेलत व्रजचंदसों हसिये || १ ||
वसें बेठन सबे सुख माई |
एक कठिन दू:ख दूर कन्हाई || २ ||
माखन चोरे दूर दूर देखूं |
जीवन जन्म सुफल कर लेखुं || ३ ||
जलचर लोचन छिन छिन प्यासा |
कठिन प्रीति परमानंददासा || ४ ||
खिरक खेलत व्रजचंदसों हसिये || १ ||
वसें बेठन सबे सुख माई |
एक कठिन दू:ख दूर कन्हाई || २ ||
माखन चोरे दूर दूर देखूं |
जीवन जन्म सुफल कर लेखुं || ३ ||
जलचर लोचन छिन छिन प्यासा |
कठिन प्रीति परमानंददासा || ४ ||
में तो प्रीति स्याम सों कीनी
में तो प्रीति स्याम सों कीनी |
कोऊ निंदो कोऊ वंदो अब तो यह घर दीनी || १ ||
जो पतिव्रत तो या ढोटा सों इने समर्प्यो देह |
जो व्हभिचार तो नंदनंदनसों बाढ्यो अधिक सनेह || २ ||
जो व्रत गह्यो सो औरन भायो मर्यादा को भंग |
परमानन्दलाल गिरिधर को पायो मोटो संग || ३ ||
कोऊ निंदो कोऊ वंदो अब तो यह घर दीनी || १ ||
जो पतिव्रत तो या ढोटा सों इने समर्प्यो देह |
जो व्हभिचार तो नंदनंदनसों बाढ्यो अधिक सनेह || २ ||
जो व्रत गह्यो सो औरन भायो मर्यादा को भंग |
परमानन्दलाल गिरिधर को पायो मोटो संग || ३ ||
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