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चैत्रमास संवत्सर परिवा, नयो परव मान्यो हे आज

चैत्रमास संवत्सर परिवा, नयो परव मान्यो हे आज ।
नूतन लाड, लड़ावत सब विधि,  श्रीवल्लभ श्रीविठ्ठल महाराज ॥ १ ॥

नये बसन मनिगन आभूषण,  धरत असन नये रूचि उपजाय ।
अचमन  करि,  मुख पोंछि बसनतें, बीरी देत सुगंध मिलाय ॥ २ ॥

विविध फूलमंडली मनोहर, आँगन मोतिन चोक पुराय ।
आरती करत जु, मात यशोदा,  न्योछावर करि अति सचुपाय ॥ ३ ॥

नवदल निम्ब मधुर मिश्री ले, देत सबनकों मन हरखाय ।
ब्रह्मदासकों, माला बीडा देत, प्रभु अति निकट बुलाय ॥ ४ ॥

સંવત્સરોત્સવ ચૈત્ર સુદ-૧

ચૈત્ર માસ સંવત્સર પરિવા, વરસ પ્રવેશ ભયો હૈ આજ ।

કુંજમહલ બૈઠે પિય પ્યારી, લાલન પહરે નૌતન સાજ ।।૧।।

આપુ હી કુસુમહાર ગુહિ લીને, ક્રીડા કરત લાલ મન ભાવત ।

બીરી દેત દાસ ‘પરમાનંદ’ હરખિ નિરખિ જસ ગાવત ।।૨।।

ભાવાર્થઃ

અષ્ટછાપ ભક્તકવિ શ્રીપરમાનંદદાસજીની આ રચના છે.
આજૈ ચૈત્ર માસના પડવાના દિવસે નવા સંવત્સર-વર્ષનો પ્રારંભ થયો છે. આજે નવાં સાજ અને વસ્ત્રો ધારણ કરી, પુષ્પના કુંજમહલમાં શ્રીયુગલસ્વરૂપ-પ્રિયતમ અને પ્રિયાજી બિરાજ્યાં છે. શ્રીયુગલસ્વરૂપ પોતાના શ્રીહસ્તથી પુષ્પમાળાઓ ગૂંથે છે અને પોતાની મનભાવતી રસમય ક્રીડાઓ કરે છે. શ્રીપરમાનંદદાસજી પોતાના આધિદૈવિક સખી સ્વરૂપે શ્રીયુગલસ્વરૂપને પાનની બીડી આરોગાવે છે અને આ લીલાનાં દર્શન કરતાં હરખાઈને તેનાં યશોગાન ગાય છે

सब मिली ग्वालिनी देत असीस

सब मिली ग्वालिनी देत असीस |
नंदरानी ढोटा जीवौ कोटि बरीस || १ ||

धन्य यह कूँखि भरी सुभ लच्छिन जिन सगरौ ब्रज छायौ |
ऐसौ पूत जायौ नंदरानी जिन करि अटल बसायौ || २ ||

अब यै बेगि बढौ तुमरे गृह ठुम ठुम खेलत डोलै |
श्री विठ्ठलगिरिधर रानी तुमसों मैया कही कही बोलै || ३ ||

शीतल खसखानो सुहावनो

शीतल    खसखानो    सुहावनो   मन   मान्यो   अमृत  रूप  अधर  आन्यो,
ता    मध्य      बैठे      बालकृष्ण     सुनत      राग       वास       बरसानो  ।
छूटत  हें  फुहारे  नाना  विध    होद    भरे    बादर की    छबि   कारे   कारे,
जामें  वर्षा  निर्तत   मोर  अखारे  कोकिला   सोर   करत   सुख   बरखानों  ।। 1 ।।

अतर  और  गुलाब   अरगजा   लाग्यो  सुगंध    समीर    वहत    मंद  मंद,
विजना    करत      सखी      सब    साज      लिये      नेनन      सरसानो  ।
कबहुक  जल   ले  ले   छिरकत     शीत    लगत    मानों    केलि    करत,
फिरत  गावत  दोउ  तान  तरंग  व्रजाधीश  प्रभु  तन  मन  धन  हरखानो  ।। 2 ।।

जब मेरो मोहन चलेगो घुटुरुवन

जब मेरो मोहन चलेगो घुटुरुवन,
तब हों करोंगी बधाई।
सर्वस्व वार देहोंगी,
तिही चीनू मैया कही तुतराई॥१॥

यशोदाको वचन सुनत केशोंप्रभु,
जननी प्रीति जानी अधिकाई।
नंद्सुवन सुख दियो मातको,
अति कृपाल मेरो नंद्लाई॥२॥

कहन लागे मोहन मैया मैया

कहन लागे मोहन मैया मैया।
बावा बावा नंदरायसो,
अरु हलधरसो भैया भैया॥१॥
छगन मगन मधुसुदन माधो,
सब व्रज लेत बलैया।
नाचत मोर रहत संग उनके,
तोतरे बोल बुलैया॥२॥

दुरी खेलन जिन जाऊ मनोहर,
मारेगी कहुकी गैया।
मात यशोदा ठाड़ी टेरे,
ले ले नाम कन्हैया॥३॥

सब गोकुलमें आनंद उपज्यो,
घर घर होत बधैया।
नंदनंदंकी या छबि ऊपर,
परमानंद बलि जैया॥४॥

मैयारी तू मोहि बडो कर लैरी

मैयारी तू मोहि बडो कर लैरी।
दूध दही धृत माखन मेवा,
जो मांगो सो दैरी॥१॥

कछु दुराव राखै जिन मोसो,
जोई मोई रुचेरी।
रंगभूमि में कंस पछारौ,
कहे कथा सुखसौरी॥२॥

सूरदास स्वामीकी लीला,
मथुरा वास करोरी।
सुंदरश्याम हसत जननीसो,
नन्दलालकी सौरी॥३॥

पवित्रा पहरे परमानंद

पवित्रा पहरे परमानंद।
श्रावन सुदी एकादशी के दिन,
गिरिधर परमानंद॥१॥

श्री वृषभाननंदिनी निजकर,
ग्रथित विविध पटभांत।
ता मध्य सुभग सुवर्ण सुत्रसो,
पोई नवमती जात॥२॥

पवित्रा पहरे हिंडोरे जुलत,
दोउ आनंद कंद।
जमुना पुलिनमें कुंज मनोहर,
गावत परमानंद॥३॥

બડે ખીરક મેં ઘૂમરી ખેલત

ગાય ખિલાયવેકે પદ (ભોગ આરતીમે)

બડે ખીરક મેં ઘૂમરી ખેલત |
મોહનલાલ ખિલાવત રંગભર ગગન ગરજ ઘંટા ધ્વનિ ફેલત || ૧ ||
ઉસર જાત વ્રજરાજ લાડીલે ધેનું ડાઢ જબ મેલત |
નંદદાસ પ્રભુ મુદિત નંદરાની  હીહીરસ સાગર મેં ઝેલત || ૨ ||

આરોગત આપુન પર્વત રૂપ

આરોગત આપુન પર્વત રૂપ |
વે દેખો   જુ   માગી   લેત   હૈ   ચૌદ   ભુવન કો   ભૂપ || ૧ ||
બડભાગી   હૈ   નંદ   જશોદા   જીન   પાયો   હરિ  સુત |
લાલ   દેખી   આતુર  ધાઈ   લે   ઓદન પાયસ   પૂત || ૨ ||
મીટ્યો ભાગ જાન્યો જબ સુરપતિ બાઢ્યો હૈ અતિ કોપ |
'કૃષ્ણદાસ'  ગિરિવર  કર   ધાર્યો ઇન્દ્ર મહોચ્છવ લોપ || ૩ ||

આજ દૂજ ભૈયાકી

આજ  દૂજ  ભૈયાકી  કહીયત  કરલીયે   કંચનથાલકે |
કરો તિલક તુમ બહેન સુભદ્રા બલ અરુ શ્રી ગોપાલકેં || ૧ ||
આરતી કરત દેત   નોછાવર   વારત   મુક્તામાલકે |
આસ્કરણ  પ્રભુ  મોહન  નાગર પ્રેમ પુંજ વ્રજબાલકે || ૨ ||

दिन दुल्हे मेरो...

ब्याह के और शेहरा के पद

दिन दूल्हे मेरो कुंवर कन्हैया |
नित्य उठ  सखा  शृंगार  बनावे   नित्य ही  आरती उतारत मैया || १ ||
नित्य उठ आँगन चन्दन लिपावे नित्य ही  मोतिन  चौक  पुरैया |
नित्य ही   मंगल   कलश   धरावे   नित्य ही   बंदनवार    बंधैया || २ ||
नित्य उठ ब्याह गीत मंगल ध्वनि नित्य सुरनर मुनि बेद पढैया |
नित्य नित्य आनंद होत वार निधि नित्य ही गदाधर लेत बलैया || ३ ||

केसरकी धोती कटि..

श्री विठ्ठलनाथजी की वधाई

केसर की धोती कटि, केसरी उपरना ओढें, तिलक मुद्रा  धर ठाडे, मंदिर गिरिधर के |
दोउजनकी   प्रीति  कछू,  काहुपें  न  कही  जात,  उत नन्दनंदन इत, वल्लभ  वरकें || १  ||
करकें   शृंगार   आज,   लाडिले  गोपालजूके,   लेत हैं   बलाय  वारवार   दोउ   करकें |
बेऊ  मुस्कात  जात,   फुले न समात  गात,   कहें   हरिदास  में,  निहारे  द्रग   भरकें || २  ||

कैसे करि कीजै वेद कह्यो

कैसे करि कीजै वेद कह्यो |
हरिमुख निरखत विधि-निषध कौ नाहिन  ठोर रह्यो || १  ||
दु:ख को  मूल  सनेह   सखी  री  सो  उर  पैठी   रह्यो |
परमानन्द  प्रभु  केलि  समुद्र में  पर्योसु  लै निबह्यो || २  ||

मोहन मुनि हे आये हो...

शिवरात्रि के दिन धमार के पद 

मोहन मुनि हे आये हो, हो मेरे ललना सबको मनहर लीनों ।। ध्रु. ।।
रसमसी    चाल   चले    अलबेली    अंग    चढाय   विभूत ।
कानन कुंडल मुकुट विराजत पीताम्बर  ओढ़े   कटि   पूत ।। १ ।। 
दंड   कमंडल    गहि    जपमाला    आसन   लीनों   बनाय ।
कोटि   जतन   राधा  पचिहारी  मुख न बोलत मुसिक्याय ।। २ ।।
जगजीवन  जोगी  हे   आये   अरस   परस   लिये   ग्वाल ।
मानों    कोटि   उडुगण   शशि   जैसे   ऐसे   बने नंदलाल ।। ३ ।।
दृग दृग  थेई  थेई  धुनि   बाजे   इत   गोपी   उत    ग्वाल ।
आनंद भई  हैं सकल व्रज   निता   बोलत   बचन   रसाल ।। ४ ।। 
ब्रह्मादिक   इंद्रादिक    मुनिवर    देखत   कोटि   तेतीस ।
श्री गोपीनाथ एक ख्याल बनायो सकल  रचना   को  ईस ।। ५ ।।
जान्यों भेद बलि मोहन को  मुख  माँड्यो सकल  सुवास ।
जय जय कार करत सुरनर मुनि वरखत कुसुम  अकास ।। ६ ।।
नवल किसोर कहाँ  लो   वरनो   शोभा    कही   न   जाय ।
सूरदास   वलि   लाल  छबीले   निगम    निरंतर    गाय ।। ७ ।।

माई मेरौ मन मोह्यो सांवरे मोहि

माई मेरो मन मोह्यो, सांवरे मोहि, घर अंगना न सुहाई माई,अब हाँ हो माई ।
ज्यों  ज्यों  आँखिन   देखियै  मेरौ,   त्यों त्यों  जिय ललचाई माई ।। १ ।। मेरो मन...

हेली मनमोहन अति सोह्नौ ईत व्है निकस्यों आई माई, अब हाँ हो माई ।
मोहि   देखि   ठाडौ  भयौ   वह,   चितयौ   मुरि     मुसकाई    माई ।। २ ।। मेरो मन...

रूप ठगोरी डारि कैं चल्यौ, अंग छबि छैल दिखाई माई, अब हाँ हो माई ।
नैन   सैन   दे   साँवरौ   मन   लै    गयो   संग        लगाई     माई ।। ३ ।। मेरो मन...

लोक लाज कुल कांनि की  जिय कछू  न ठीक ठहराई माई, अब हाँ हो माई ।
कै लै चलि मोहि स्याम पै कै स्याम   ही   आनि     मिलाई   माई ।। ४ ।। मेरो मन...

प्रान प्रीति परबस  परे  अब, काहू की न बस्याई  माई, अब हाँ हो माई ।
रसिक   बाल   नंदलाल   पै   रसिक   सदां   बल       जाई   माई  ।। ५ ।। मेरो मन...

राधे तेरे भवन हों आऊं

राधे तेरे भवन हों आऊं ।
सादर कहत सांवरो  मोहन  नेंक   दूध   जो  पाऊं ।। १ ।।
मात पिता हूँ विलगु न माने  ओर  यह भेद न जाने ।
जो तू सोंह   करे   बाबा  की   तो  मेरे   मनमाने ।। २ ।।
सब  दिन  खेलो   मेरे  आंगन अपने नेन सिराऊं ।
परमानंद प्रभु विनती  किनी   अपने मित्र बुलाऊँ ।। ३ ।।

लाल नेक देखियें भवन हमारो

लाल नेक देखियें भवन हमारो ।
द्वितीयापाट सिंहासन बैठे अविचल राज  तिहारो ।। १ ।।
सास हमारी खरिक सिधारी पीय वन गयो सवारो ।
आसपास घर कोऊ  नाहीं   यह  एकांत  हे  न्यारो ।। २ ।।
ओट्यो दूध सद्य  धौरीको  लेहु  श्याम  घन पीजे ।
परमानंददास  को ठाकुर कछु कह्यो हमारो कीजे ।। ३ ।।

लन की मंडली मनोहर...

फूलन की   मंडली   मनोहर   बैठे  जहां  रसिक  पिय  प्यारी ।
फूलन के बागे और भूषण फूलन के फूलनही की पाग संवारी ।। १ ।।
ढिंग  फूली  वृषभाननंदिनी     तैसी  ये  फूल  रही  उजियारी ।
फूलन  के   झूमका   झरोखा   बहु  फूलन की   रची   अटारी ।। २ ।।
फूले सखा चकोर निहारत   बिच  चंद   मिल  किरण संवारी ।
चतुर्भुजदास   मुदित   सहचारी   फूले   लाल   गोवर्धनधारी ।। ३ ।।

चैत्र मास संवत्सर परवा वरस प्रवेश...

चैत्र  मास संवत्सर   परवा   वरस   प्रवेश   भयो   हे   आज ।
कुंज महेल बैठे पिय  प्यारी   लाल   नये  हेरे  नौतन  साज ।। १ ।।
आपु ही कुसुम हार गुहलीने  क्रीडा करत लाल मन भावत ।
बीरी  देत  दास  परमानंद   हरखि   निरखि   जस   गावत ।। २ ।।

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