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मानुष हौं तो वही रसखानि....

मानुष हौं तो वही रसखानि  बसौं   ब्रज   गोकुल   गाँवके   ग्वारन ।
जो पसु हौं तो कहा  बसु मेरो,   चरौं  नित  नन्दकी  धेनु  मंझारन  ।। १ ।।
पाहन  हौं तो वही गिरिकौ,  जो  धर्यौ  कर    छत्र    पुरंदर - धारन  ।
जो खग हौं तो बसेरो  करौं  मिली,  कालिंदी-कूल-कदम्बकी डारन ।। २ ।।

या लकुटी अरु कामरिया पर

या लकुटी अरु कामरिया  पर,   राज   तिहूँ   पुरकौ   तजि  डारौं  ।
आठहुं सिध्धि  नवो निधिकौ सुख, नन्द की गाई चराई बिसारौं ।। १ ।।

रसखानि, कबों इन आँखिनसों, ब्रज के बन-बाग़ तड़ाग निहारौं ।
कोटिक हों  कलधौत के धाम,  करील की  कुंजन   ऊपर   बारौं ।। २ ।।

गावैं गुनी, गनिका, गन्धर्व औ सारद...

गावैं गुनी, गनिका, गन्धर्व  औ  सारद,   सेष  सबै गुन  गावैं ।
नाम अनन्त गनन्त गनेस-ज्यों, ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावैं ।। १ ।।
जोगी, जती, तपसी अरु सिध्ध, निरंतर जाहि समाधि लगावैं ।
ताहि अहीरकी छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ  पै  नाच  नचावैं ।। २ ।।

सेस, महेस, गनेस, दिनेस...

सेस, महेस,  गनेस,  दिनेस,   सुरेसहु   जाहि निरन्तर  गावैं ।
जाहि  अनादि, अनंत, अखण्ड,  अछेद  अभेद  सुबेद  बतावैं ।। १ ।।
नारद-से सुक  ब्यास  रटैं,  पचिहारे,  तऊ पुनि  पार न  पावैं ।
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरी छाछ पै नाच नचावैं ।। २ ।।

खंजन-नैन फँसे पिंजरा-छबि...

खंजन-नैन  फँसे  पिंजरा-छबि,   नाहिं  रहें   थिर  कैसेहूँ माई !
छूटि गयी कुल कानी सखी, रसखानि, लखी मुसुकानि सुहाई ।। १ ।।
चित्र-कढ़े-से रहैं मेरे  नैन,   न  बैन   कढ़े   मुख  दीनी   दुहाई ।
कैसी करों, जिन जाव अली,  सब बोली उठें,  यह बावरी आई ।। २ ।।

कानन दै अँगुरी रहिबो..

कानन दै अँगुरी  रहिबो,   जब हीं  मुरली-धुनि  मन्द  बजै  है ;
मोहिनी-तानन सों रसखानि, अटा  चढ़ी गोधन गैहै  तौ  गैहै ।
टेरी कहौं सिगरे ब्रज-लोगनि, काल्हि कोऊ कितनो  समुझै है ;
माई री, वा मुख की मुसुकानि, सँभारी न जैहै न जैहै  न  जैहै ।।

आजू री, नंदलला निकस्यो...

आजू री,  नंदलला   निकस्यो,  तुलसी-बनतैं    बनकैं  मुसकातो ।
देखे बनै न बनै  कहते  अब,   सो  सुख  जो  मुख में  न  समातो ।। १ ।।
हौं रसखानि, बिलोकिबेकों कुलकानि को काज कियो हिय हातो ।
आय गई अलबेली अचानक,  ए  भटु  लाज  कौ  काज  कहा तो ?।। २ ।।

धूरि-भरे अति सोभित स्यामजू..

धूरि-भरे अति सोभित स्यामजू,  तैसी  बनी सिर सुन्दर चोटी ।
खेलत-खात फिरैं अंगनां,   पगपैजनी  बाजतीं,  पीरी  कछोटी ।। १ ।।
वा छबि कों रसखानि बिलोकत, बारत कामकलानिधि-कोटी ।
काग के भाग कहा कहिए,  हरी-हाथसों  लै  गयो माखन-रोटी ।। २ ।।

ब्रह्म मैं ढूँढयौ पुरानन गानन...

ब्रह्म मैं ढूँढयौ पुरानन गानन,   बेद-रिचा सुनि चौगुने चायन ।
देख्यो सुन्यो कबहूँ न कितै, वह कैसे सरूप औ  कैसे सुभायन ।। १ ।।
टेरत हेरत हारि परयौ, रसखानि,   बतायो  न  लोग-लुगायन ।
देखौ, दुर्यौ वह कुंज-कुटीर में, बैठ्यौ  पलोटत राधिका-पायन ।। २ ।

द्रौपदी औ गनिका, गज, गीध...

द्रौपदी औ गनिका, गज, गीध, अजामिलसों कियो सो न निहारो ।
गौतम-गेहिनी   कैसे  तरी,   प्रहलाद कौ  कैसे  हर्यौ  दुःख   भारो ।। १ ।।
काहे को सोच करै रसखानि,  कहा  करि  है   रवि-नन्द   विचारो ।
कौन की   संक   परी   है  जू   माखन-चाखनहारो  है   राखनहारो ।। २ ।। 

जा दिन तें निरख्यौ नंद-नंदन

जा दिन तें निरख्यौ नंद-नंदन, कानि तजि घर बंधन  छूट्यो ।
चारू बिलोकनि की निसी मार, संभार गयी  मन मारने लूट्यो ।। १ ।।
सागर कौ सरिता जिमि धावति  रोकी रहे कुल कौ पुल टूट्यो ।
मत्त भयो मन संग फिरै,   रसखानि सुरूप सुधा-रस   घूट्यो।। २ ।।

बेनु बजावत, गोधन गावत..

बेनु बजावत, गोधन गावत, ग्वारन के संग गोमधि आयो ।
बांसुरी में उन मेरो नाम लै , साथिन के मिस टेरि सुनाय़ो ।। 1 ।।

ए सजनी, सुनि सास के त्रासनि, नंदके पास उसासनि आयो ।
केसी करों रसखानि तहीं चित चेन नहीं, चित चोर चुरायो ।। 2 ।।

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