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कमल मुख देखत, तृप्त ना होय

कमल मुख देखत, तृप्त ना होय ।
यह सुख कहा दुहागीन जाने, रही निसाभर सोय ॥ १॥

ज्यों चकोर चाहत उडुराजे, चंद वदन रही जोय ।
नेक अकोर देत नही राधा, चाहत पीयरी निचोय ॥ २॥

उन् तो अपनों सर्वस्व दीनो, एक प्राण वपु दोय ।
भजन भेद न्यारो परमानन्द, जानत विरला कोय ॥ ३॥

मेरे तन की तपत बुझाई

मेरे तन की तपत बुझाई  ।
बीदा भई ग्रीषम   ऋतु   आली   अब    बरखा    ऋतु   आई  ।। 1 ।।
जब  मेरे   गृह  आवेंगे   गिरिधर  तब हों  नीके  करूंगी  बधाई  ।
नाना     विध के   साज    सिंगारौं     बिरहनी    पीर    मिटाई  ।। 2 ।।
शुभ  मंगल आज  कुंज  भवन में  पोहोप सुवास सुगंध  छवाई  ।
'चतुर्भुज'  प्रभु   मेरे   भवन में   पधारो   वासों   तन  विसराई  ।। 3 ।।

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