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अक्षय तृतीया शुभ दिन नीको...

अक्षय तृतीया शुभदिन नीको,  चंदन  पेहेरत नवलकिशोर ।
उज्जवल   वसन, नवीन सो राजत,  फेंटा के नीके छटछोर ।। १ ।।
केसर   तिलक   माल   फूलनकी,    पेहेरें   ठाडें   रंग   भरें ।
आसपास,  युवतीजन  शोभित,   गावत  मंगल  गीत खरें ।। २ ।।
मुसकत  हैं    थोरे   थोरे   से,     बोलत     रसाल   लखीरी ।
अति अनुराग, भरें मोहन कों, कृष्णदास तहां देत है बीरी ।। ३ ।।

सुगन मनाय रही व्रजबाला, मन भावन घर आवन कों

सुगन  मनाय   रही  व्रजबाला,   मन  भावन  घर  आवन कों ।
चंदन भवन लिपाय सोंज  सज,   अरगजा  अंग लगावन कों ।। १ ।।
भोग राग रंग संपूरन आनंद,    अपनी   रूचि   उपजावन कों ।
कृष्णदास गिरिधरन संग मिली, बिरह व्यथा बिसरावन कों ।। २ ।।

लेहु ललन कछु करहु कलेऊ, अपुने हाथ जीमाउंगी

लेहु ललन   कछु   करहु   कलेऊ,    अपुने   हाथ   जीमाउंगी ।
सीतल   माखन    मेलश्री    कर,     कर     कोर      खवाउंगी ।। १ ।।
ओट्यो  दुध  सद्य    धोरीको,   सीयरो   कर   कर   प्याउंगी ।
तातो    जान    जो  न  सुत  पीवत,   पंखा   पवन    ढुराउंगी ।। २ ।।
अमित  सुगंध सुवास सकल अंग,  करि उबटनो गुन गाउंगी ।
उष्ण   सीतल हु  न्हवाय  खोर  जल,   चंदन  अंग  लगाउंगी ।। ३ ।।
त्रिविध ताप नस जात देखि छबि,   निरखत  हीयो सीराउंगी ।
परमानंद सीतल करि  अखियाँ,   बानिक  पर  बल  जाउंगी ।। ४ ।।

उठत प्रात उर आनंद भरकें...

उठत  प्रात   उर   आनंद   भरकें,   पीजे  शुध्ध   जमुना जल निर्मल  ।
पान परसत अंग अंग मिटे आरत, सनमुख होत रसना रस निश्चल  ।। १ ।।
गोपीजन    व्रजवास    धर्मकुल,    दैवीजन    सब   आवत   हैं   चल  ।
रहत नहीं दोष सुमरें लक्ष्मण सूत सब,   सुख वास चरण दृढ़ के बल  ।। २ ।।
त्रिविध   ताप   मेटन के   साधन  ए,   लपटनों   चंदन  कर   सीतल  ।
परमानंद   तमाल   वल्लभ की,   हम  पर  रहो  छाया अति सीतल  ।। ३ ।।

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