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नख कहाँ लागे वन, वानरा लगाये नख

शृंगार औट-सन्मुख के पद


नख कहाँ लागे वन, वानरा  लगाये  नख,   चखक्यों  राते  प्रात,  देख्यो  ताते  भान को |
चन्दन लग्यो है कहाँ, विघ्न हरण पूजा कीनी, वंदन लग्यो है कहाँ, परस भयो थान को || १  ||
रैन  रहे  कहाँ,  नट  नृत्यत   जहाँ,   अरवरे   क्यों   बोलो  मोसों,   डर   भयो   आन को |
गुजरी  सो  गुजरी  अब,  आगें   आय  ठाडे सूर, थेगरी कहाँ लों देत, फाटे आसमान को || २  ||

लहेंकन लागी बसंत बहार सखी..

लहेंकन   लागी   बसंत   बहार   सखी,  त्यौं -त्यौं   बनवारी  लाग्यो   बहेकन |
फूल   पलास    नख    नाहर     केसें    तेसें,     कानन     लाग्यौं      महेकन || १  ||
कोकिल मोर सुक सारस हंस खंजन,मीन भ्रमर अँखियाँ देखि,अति ललकन |
नंददास   प्रभु   प्यारी  अगबानी,   गिरिधर  पिय कौं  देखती  भयौ  श्रमकन || २  ||

नई ऋतु को आगम भयो सजनी

नई  ऋतु को   आगम   भयो   सजनी,   बिदा   होत   हेमंत |
इन  बिरहिन के  भाग्य  तें  सजनी,   आवत  चल्यौ  बसंत || १  ||
अब फूलें है नये द्रुम बेली,  कामिनी के  मन  अति ही हसंत |
कृष्णदास प्रभु रस बस कर लीनो, सीतकाल कौ आयौ अंत || २  ||

ससकि ससकि रही अपने भवन मैं

ससकि ससकि रही अपने भवन मैं चार जाम कौं कियो बिहार |
कब आवे मेरे घर   प्रीतम   बिधना   सौं   रही   अचरा   पसार || १  ||
अब   आई    बसंत     ऋतु     सजनी    मदन     राई    दरबार |
नंददास  प्रभु  रस  बस  कर  लीनो जाडो चल्यौं दौऊ कर झार || २  ||

प्रीतम को कछु दोष नहीं री..

प्रीतम को   कछु    दोष    नहीं   री,    आयो   सीत   बेरी   हमारो |
प्रीतम को मग जोवन कारन राखन नहीं देत वदन उधारो  सखी || १  || आयो...
सीतल  पवन  अकेली   जान कें  पठवत  आलस  करन   संभारो |
व्रत को   तजि   आकृत  निंद्रा  सों   मिली  ठगति  ठगारो  सखी || २  || आयो...
कहूँगी   जाए    जनाए    आज    मिले    मोसो    प्रीतम    प्यारो |
चतुरभुज  प्रभु  नेह   द्रोही    जाड़ा कों   कीजे  मुँह   कारो   सखी || ३  || आयो...

भूतल महा महोत्सव आज...

भूतल  महा  महोत्सव  आज  ।
श्री लक्ष्मण गृह प्रकट भये हैं,  श्री   वल्लभ   महाराज  ।। १ ।।
आज्ञा  दई  दया  कर  श्री हरी,   पुष्टि   प्रकटवे   काज  ।
कलिमें   जन्म  उबार्यो  ततछिन,   बूडत  वेद  जहाज  ।। २ ।।
आनंद  मूरति निरखत  नयनन,  फूले  भक्त  समाज  ।
नाचत गावत विवश भये सब, छांड लोक  कूल  लाज  ।। ३ ।।
घर घर मंगल बजत बधाई,   सजत   नये   नये साज  ।
मगन भये तन गिनत न  काहू,  तिन  लोक पर गाज  ।। ४ ।। 
लीलासिंधु    महारस    अबतें,   बंधी    प्रेमकी   पाज  ।
रसिक शिरोमणि सदा विराजो, श्री वल्लभ शिरताज  ।। ५ ।।

१० - जा मुख तें श्री यमुने यह नाम आवे

जा मुख तें श्री यमुने यह नाम आवे ।
तापर कृपा करत श्री वल्लभ प्रभु, सोई श्री यमुना जी को भेद पावे ॥१॥
तन मन धन सब लाल गिरिधरन को देकें, चरन जब चित्त लावे ।
छीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल, नैनन प्रकट लीला दिखावे ॥२॥

Ja mukhte ShriYamuna yeh naame aawhe taapar kripa karat Shri Vallabh Prabhu, 
Sohi ShriYamunaji ko bhedh pawhe.
Tan man dhan sab Lal Giridharan ko, deke charan chit lawhe,
Chitswami Giridharan Shri Vithal, nein  prakat lila Dhikhave.

९ - धाय के जाय जो श्री यमुना तीरे

धाय के जाय जो श्री यमुना तीरे ।
ताकी महिमा अब कहां लग वरनिये, जाय परसत अंग प्रेम नीरे ॥१॥
निश दिना केलि करत मनमोहन, पिया संग भक्तन की हे जु भीरे ।
छीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल, इन बिना नेंक नहिं धरत धीरे ॥२॥

Dhayke jaaye jo ShriYamuna teere taaki mahima ab kahanlag varniye, 
Jaaye parsat adak prem neere.
Nish dina keli karat Manmohan Piyasadak bhaktanki hain ju bhire,
Chitswami Giridharan ShriVithal, in bina nek nahin dharat dhire.

११ - धन्य श्री यमुने निधि देनहारी

धन्य श्री यमुने निधि देनहारी ।
करत गुणगान अज्ञान अध दूरि करि, जाय मिलवत पिय प्राणप्यारी ॥१॥
जिन कोउ सन्देह करो बात चित्त में धरो, पुष्टिपथ अनुसरो सुखजु कारी ।
प्रेम के पुंज में रासरस कुंज में, ताही राखत रसरंग भारी ॥२॥
श्री यमुने अरु प्राणपति प्राण अरु प्राणसुत, चहुजन जीव पर दया विचारी ।
छीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल प्रीत के लिये अब संग धारी ॥३॥

Dhanya ShriYamune nidhi dhenhaari, 
Karat gunghaan agyaan adh dur kari, Jaye milvat Priya Pranpyari, 
Jin koi sandeh karo baat chit mein dharo, Pushtipat anusro sukh jo kaari, 

Prem ke punj mein raasras kunj mein, taahi rakhat rasradakh bhaari.
ShriYamune auro Pranpati pran auro pransut, chahunjan jeev par daya vichari,
Chitswami Giridharan Shri Vithal, preetke liye aab sadak dhari.

१२ - गुण अपार मुख एक कहाँ लों कहिये

गुण अपार मुख एक कहाँ लों कहिये ।
तजो साधन भजो नाम श्री यमुना जी को लाल गिरिधरन वर तबहि पैये ॥१॥
परम पुनीत प्रीति की रीति सब जानिके दृढकरि चरण कमल जु गहिये ।
छीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल , ऐसी निधि छांडि अब कहाँ जु जैये ॥२॥

Gun apaar mukh ek kahanlo kahiye,
Tajo sadhan bhajo naam ShriYamunaji ko LalGiridharanvar tabhi peye.
Param Puneet  pritike riti saab janike dhran kar charan kamal ju grahiye,
Chitswami Giridharan Shri Vithal, aisi nidhi chaad ab kahan ju jaaye.

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