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काजर वारी गोरी ग्वारि

काजर  वारी   गोरी   ग्वारि,    या   सांवलिया की    लगवारि ।
निसदिन रहत प्रेम रँग भीनीं,   हरि  रसिया  सौं  यारी  कीनीं ।। १ ।।

मदन गुपाल जानि रिझवारी,  नाना  बिधि के करती सिंगारी ।
मिलन काज रहै अंग  अँगोंछै,  सरस  सुगंधन  तेल  तिलोंछै ।। २ ।।

अंजन नांहिं  न भटु यह  दीये,  स्याम  रँग   नैंननि  में  पीये ।
गावति हु जसुमति गृह आवै ,   कृष्ण  चरित बहु गाई सुनावै ।। ३ ।।

सुंदर  स्याम  सुनै  ढिंग आई, चितवति ही चित हरि लै जाई ।
कोऊ कहे  काहू की  न  मानैं,   अपने  मन की  गाई   बखानै ।। ४ ।।

रामराई  प्रभु  यौं  समुझावै,  कही भगवान् कोऊ नीकैं  गावै ।
लखी इन स्याम कहै निरधार, इहि  लगवारनि वहि लगवार ।। ५ ।।

जय श्री जगन्नाथ हरि देवा

रथयात्रा के पद : व्रतोत्सव भावना

श्री गुसाईंजी वि. सं. 1616 को महासुद 13 के दिन जगदीश पधारें. वहां आप छ माह बिराजें. रथयात्रा का उत्सव उन्होंने वहीँ किया था. उसी समय भगवान जगदीश ने  पुष्टिमार्ग में रथयात्रा का उत्सव आरंभ करने की आज्ञा दी थी. उसी समय पीपली गाँव के माधवदास आपश्री के साथ थे. उन्होंने रथ की भावना के अनुसार पद गाया : "जय श्री जगन्नाथ हरि देवा ". इस पद को सून कर श्री गुंसाईजी प्रसन्न हुए और रथयात्रा के उत्सव में प्राथमिक पद के स्वरूपमें इस को अग्रस्थान दिया. और सूरदासजी के दो भावात्मक पदों 1. "वा पटपीत की फहेरान " 2. "सुंदर बदनरी सुख सदन श्याम को "भी स्थान दिया.

जब श्री गुंसाईजी अड़ेल पधारें तब रासा नामक सुथार के पास रथ सिद्ध कराके उसमें श्री नवनीतप्रिय प्रभु को  पधराके रथयात्रा का उत्सव आषाढ़ सूद बीजको पुष्य नक्षत्र के समय को आरम्भ किया है.

जय श्री जगन्नाथ हरि देवा ।
रथ बैठे प्रभु अधिक बिराजत, जगत करत सब सेवा  ।। 1 ।।
सनक सनंदन ओर ब्रह्मादिक,  इन्द्रादिक जुर आये  ।
अपनी अपनी  भेट सबे ले,   गगन  विमानन  छाये  ।। 2 ।।
रत्नजटित रथ नीको लागत,  चंचल  अश्व  लगाये ।
नरनारी  आनंद  भये  अति,  प्रमुदित  मंगल  गायें  ।। 3 ।।
गारी देत दिवावत अपनपे, यह विधि रथहिं चलाये  ।
रामराय  श्री  गोवर्धनवासी,    नगर  उड़ीसा   आये  ।। 4 ।।

श्रीनाथ जी को ध्यान मेरे निशदिनारी माई

श्रीनाथ जी को ध्यान मेरे निशदिनारी माई । मेरे मन के मेहेल प्रीतिकुंज जामे जादोराई ।
शामरे बरन कोमल चरन नख देखे चकचोंधी होत, पायन उपर पेंजनी सो विविध जो बनाई ॥१॥
दाहिने पद पद्‌म आली ताते पग टेढो धरत ऐसे चरण सुख करण है सदा दुखदाई ॥
वनमाल मुक्तामाल, कंठ बनी कौस्तुभमणि, पीतांबर की चटक तामे दामिनी छबी छाई ॥२॥
बाजूबंद मुद्रिका बनी नगकी अति चमत्कार अरुण अधर मुरली मधुरेसुर वजाई ॥
कमल नयन कुंडल कांति ग्रीवा प्रतिबिंब होत, आनंद भर्यो मुखारविंद रह्यो मुसकाई ॥३॥
मोरमुकुट लटकचटक घूंघरवारे अलकझलक , किये चंदनखोर डगमगी चाल सुंदरताई ।
कहि भगवान हित रामरायप्रभु निरख भयो बिहाल श्रीगुपाल रसना रटलाई ॥४॥

जसोदे बधाइयाँ बधाइयाँ जसोदे बधाइयाँ

जसोदे बधाइयाँ बधाइयाँ जसोदे बधाइयाँ।
नंदरानी दे लाल ऊपना सेस सनेह जिवाइयाँ॥१॥
सजल चंदा रवि कीता फूली अंग न माइयाँ।
आज सबे सुखदानियाँ व्रज भीना सभी भलाइयाँ॥२॥
आनन्द भरियाँ सोहनियाँ सब गोपियाँ तो घर आइयाँ।
पुत्र जायो जग जीवना तेडे लागि बडाइयाँ॥३॥
तेडे भागि सुख होंदा सभी गोल घुमाइयाँ।
अमृतसार जौ लाधा ऐसी पुरियाँ केतिक मगाइयाँ॥४॥
अखियाँ ठंडियाँ सोहनियाँ ऐसी साधा सबे पुजाइयाँ।
सुखी होए सुरनर मुनि मानो रंक निधि पाइयाँ ॥५॥
दूध दही सिर पाँवडे नाचे दे ग्वाला खेल मचाइयाँ।
बडभागी नंदजू दानदें मोहो मांगी ठकुराइयाँ॥६॥
’रामराय’ प्रभु प्रगटिया ’भगवान लला’ मन भाइयाँ।
जसोदे बधाइयाँ बधाइयाँ जसोदे बधाइयाँ।

ओर कोऊ समझे सो समझ

ओर कोऊ समझे सो समझे हमकु इतनी समझ भली ।
ठाकुर नंदकिशोर हमारे ठकुरानी वृषभान लली ॥१॥
श्रीदामा आदि सखा श्याम के श्यामा संग ललितादि अली ।
व्रजपुर वास शैल वन फिहरत कुंजन कुंजन रंगरली ॥२॥
इनके लाड चाहु सुख सेवा भाव वेल रस फलन फली ।
कहि भगवान हित रामराय प्रभु सबन तें इनकी कृपा भली ॥३॥

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