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दिन दुल्हे मेरो...

ब्याह के और शेहरा के पद

दिन दूल्हे मेरो कुंवर कन्हैया |
नित्य उठ  सखा  शृंगार  बनावे   नित्य ही  आरती उतारत मैया || १ ||
नित्य उठ आँगन चन्दन लिपावे नित्य ही  मोतिन  चौक  पुरैया |
नित्य ही   मंगल   कलश   धरावे   नित्य ही   बंदनवार    बंधैया || २ ||
नित्य उठ ब्याह गीत मंगल ध्वनि नित्य सुरनर मुनि बेद पढैया |
नित्य नित्य आनंद होत वार निधि नित्य ही गदाधर लेत बलैया || ३ ||

आज नन्दलाल मुखचंद नयनन निरख

आज नन्दलाल मुखचंद नयनन निरख, परम मंगल  भयो,  भवन मेरे |
कोटि   कंदर्प   लावण्य   एकत्र   कर,   वारु   तब    ही  जब,   नेक  हेरे || १||
सकल सुख सदन हरषित वदन गोपवन, प्रबलदल  मदनदल, संग घेरे |
कहो कोऊ कैसेंहूँ   नहीं  सुधबुध  बने,   गदाधर   मिश्र,  गिरिधरन  टेरें || २ ||

निकी लागत शीत की ऋतु...

नीकी लागत शीत की ऋतु |
अंकन दै पिय प्यारी पौढ़े,  बात  करत रस रीत की || १  ||
बन गई एक रजाई भीतर,  होत  परस्पर  जीत की ||
गदाधर प्रभु हेमंत मनावत, चाह  बढ़ी नव प्रीत की || २  ||

निकी लागत शीत की ऋतु...

नीकी लागत शीत की ऋतु |
अंकन दै पिय प्यारी पौढ़े,  बात  करत रस रीत की || १  ||
बन गई एक रजाई भीतर,  होत  परस्पर  जीत की ||
गदाधर प्रभु हेमंत मनावत, चाह  बढ़ी नव प्रीत की || २  ||

आज नंदलाल मुख चंद नयनन निरख

आज नंदलाल मुख चंद नयनन निरख परम मंगल भयो भवन मेरे ॥
कोटि कंदर्प लावण्य एकत्र कर वारूं तबही जब नेक हेरे ॥१॥
सकल सुख सदन हरखित वदन गोपवर प्रबल दल मदन संग घेरें ॥
कहो कोऊ केसेंहू नहिं सुधबुध बने गदाधर मिश्र गिरिधरन टेरें ॥ २॥

अद्भुत सोभा वृंदावन की देखो नंदकुमार

अद्भुत सोभा वृंदावन की देखो नंदकुमार।
कंत वसंत जानि आवत बन बेली कियो सिंगार॥१॥
पल्लव बरन बरन पहिरे तन बरन बरन फूले फूल।
ये तो अधिक सुहायो लागत मनि अभरन समतूल॥२॥
नंदनंदन विहंग अनंग भरी भाजत मनहुँ बधाई।
मंगल गीत गायवे को मानो कोकिल वधू बुलाई॥३॥
बहत मलय मारुत परचारग सबके मन संतोसे।
द्विज भोजन सोहत आलिंगन अधु मकरन्द परोसे॥४॥
सुनि सखी वचन गदाधर प्रभु के चलो सखी तहाँ जैये।
नवल निकुंज महल मंडप में हिलि-मिलि पंचम गैये॥५॥

आज कहूं ते या गोकुल में अदभुत वरखा आई हो

आज कहूं ते या गोकुल में अदभुत वरखा आई हो।
मणिगण हेम हीर धारा की, ब्रजपति अति झर लाई हो॥१॥
वानी वेद पढत द्विज दादुर हिये हरखि हरियाये।
दधि घृत नीर क्षीर नाना रंग बहि चले खार पनारे॥२॥
पटह निसान भेरि सहनाई महा गरज की घोरें।
मागध सूत वदत चातक पिक बोलत बंदी मोरे॥३॥
भूषण वसन अमोल नंद जु नर नारिन पहराये।
शाखा फल दल फूलन मानों उपवन झालर लाये॥४॥
आनंद भरि नाचत व्रजनारी पहरे रंग रंग की सारी।
वरन वरन बादरन लपेटी विद्युत न्यारी न्यारी॥५॥
दरिद्र दावानल बुझे सबन के जाचक सरोवर पूरे।
बाढी सुभग सुजस की सरिता दुरित तीर तरु चूरे॥६॥
उल्हयो ललित तमाल बाल एक भई सबन मन फूल।
छाया हित अनुलाय गदाधर तक्यो चरन को मूल॥७॥

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