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कब देखो मेरी ओर

कब देखो मेरी ओर
नागर   नंदकिशोर  बिनती   करत   भयो    भोर |
हम चितवत तुम चितवत नाहीं मेरे करम कठोर || १  ||
जन्म जन्म की दासी तिहारी  तापर  इतनो  जोर |
सूरदास प्रभु तुम्हारे  रोम पर  वारों   कंचन  खोर || २  ||

कमलसी अखियाँ लाल तिहारी

कमलसी अखियाँ लाल तिहारी |
तिनसों तकतक  तीर चलावत वेधत छतियां हमारी || १  ||
इन्हें कहा कोऊ दोष लगावत   ये  अजहूँ   न   संभारी |
श्री विठ्ठल गिरिधारी कृपानिधि सूरत ही ते सुखकारी || २  ||

कहाँजू बसे सारी रात नंदसुत

कहाँजू बसे सारी रात नंदसुत  |
चार पहर मोहि चार  युग  बीते   तुम जो आये परभात  || १  ||
लटपटी पाग नींदभरी  अखियाँ काजर लाग्यो तेरे गात |
चोली के बंद चुभ रहे तनमें   कसन   भयो   सब   गात || २  ||
रहो   रहो    वृषभान   नंदिनी    सुन है   यशोदा    मात |
सूरदास प्रभु तिहारे  मिलन कों रजनी कल्प सम जात || ३  ||

आये आये हो मन भावन कहांते भोर

आये आये  हो  मन  भावन   कहांते   भोर   ही   भवन   हमारे |
तुम कियो रति सुख हम दियो   अतिदु:ख  सांचे  बोल  तिहारे || १  ||
तुम कियो मधुपान घूमत हमारो मन ऐसें कैसें बनै प्राण प्यारे |
अब तो सिधारो जहां रेन वसे  तहां  गोविन्द  प्रभु  पिय  हमारे || २  ||

रातकाल प्यारेलाल आवनी बनी...

प्रातकाल प्यारेलाल आवनी बनी ।
उर सोहे मरगजी माल डगमगी सुदेश चाल, चरण कंज मदनजीत करत गामिनी ।। १ ।।
प्रियाप्रेम अंगराग सगमगी सुरंग पाग, गलित वरुहा तुलसीचूर अलकन सनी ।
कृष्णदास प्रभु गिरिधर सूरत कंठपत्र लिख्यो करजलेखनी पुनपुन राधिका गुनी ।। २ ।।

भोर ही डगमगत जीत मन्मथ चले

भोर ही डगमगत जीत मन्मथ चले ।
सकल रजनी जगे नेक नहीं पल लगे अरुण आलस वलित नयन लागत भले ।। १ ।।
कितव नागर नट चिन्ह प्रकटित करत वसन आभूषण सूरत रण दलमले ।
चतुर्भुज दास प्रभु गिरिधरन छबि बाढ़ी अधर काजर कुमकुम अंगअंग  रले ।। २ ।।

अरुझ रहे मुक्ताहल निरवारत सोहत घूघरवारे वार

अरुझ रहे मुक्ताहल निरवारत  सोहत   घूघरवारे  वार ।
रति मानी संग नंदनंदन के   छूटे बंद कंचुकी  टूटे हार ।। १ ।।
निशि के जागे दोउ नयना ढरकर हे चलत जोबन भार ।
सूरस्याम   संग     सुख     देखत     रीझे      वारंवार ।। २ ।।

मेरे तन की तपत बुझाई

मेरे तन की तपत बुझाई  ।
बीदा भई ग्रीषम   ऋतु   आली   अब    बरखा    ऋतु   आई  ।। 1 ।।
जब  मेरे   गृह  आवेंगे   गिरिधर  तब हों  नीके  करूंगी  बधाई  ।
नाना     विध के   साज    सिंगारौं     बिरहनी    पीर    मिटाई  ।। 2 ।।
शुभ  मंगल आज  कुंज  भवन में  पोहोप सुवास सुगंध  छवाई  ।
'चतुर्भुज'  प्रभु   मेरे   भवन में   पधारो   वासों   तन  विसराई  ।। 3 ।।

साँझ के साँचे बोल तिहारे

साँझ के साँचे बोल तिहारे।
रजनी अनत जागे नंदनंदन आये निपट सवारे॥१॥
अति आतुर जु नीलपट ओढे पीरे बसन बिसारे।
कुंभनदास प्रभु गोवर्धनधर  भले वचन प्रतिपारे॥२॥

लालन तहिं जाहु जाके रस लंपट अति

लालन तहिं जाहु जाके रस लंपट अति।
अति अलसाने नैन देखियत प्रगट करत प्यारी रति॥१॥
अधर दसन छत वसन पीक सह अरु कपोल श्रम बिंदु देखियति।
नख लेखनि तन लखी स्याम पट जय पताक रन जीतिय रतिपति॥२॥
कितव वाद तजो पिय हम सों जैसो तन स्याम तेसोई मन अति।
गोविन्द प्रभु पिय पाग संवरहु गिरत कुसुम सिर मालति ॥३॥

जानि पाये हो ललना

जानि पाये हो ललना ।
बलि बलि ब्रजनृप कुंवर जाके बिविसन सब निस जागे अब तहीं अनुसर॥१॥
अपनी प्यारी के रति चिन्ह हमहिं दिखावन आये देत लोंन दाधे पर।
गोविन्द प्रभु स्यामल तन तैसेई हो मन जनम हि ते जुवतिन प्रान हर ॥२॥

गोवर्धन गिरिसघनकंदरा रैन

गोवर्धन गिरिसघनकंदरा रैन निवास कियो पिय प्यारी ॥
उठ चले भोर सुरत रस भीने नंदनंदन वृषभान दुलारी ॥१॥
इत विगलित कच माल मरगजी अटपटे भूषण रागमणी सारी ॥
उतहि अधरमिस पाग रहिथस दुहूदिश छबि बाढी अति भारी ॥२॥
घूमत आवत रति रणजीते करिणिसंग गजवर गिरिवरधारी ॥
चतुर्भुजदास निरख दंपतिसुख तनमनधन कीनो बलिहारी ॥३॥

आज नंदलाल मुख चंद नयनन निरख

आज नंदलाल मुख चंद नयनन निरख परम मंगल भयो भवन मेरे ॥
कोटि कंदर्प लावण्य एकत्र कर वारूं तबही जब नेक हेरे ॥१॥
सकल सुख सदन हरखित वदन गोपवर प्रबल दल मदन संग घेरें ॥
कहो कोऊ केसेंहू नहिं सुधबुध बने गदाधर मिश्र गिरिधरन टेरें ॥ २॥

प्रातकाल प्यारेलाल आवनी बनी

प्रातकाल प्यारेलाल आवनी बनी॥
उर सोहे मरगजी सुमाल डगमगी सुदेशचाल चरणकंज मगनजीति करत गामिनी ॥१॥
प्रिया प्रेम अंगराग सगमगी सुरंग पाग, गलित बरूहातुलचूड अलकनसनी ॥
कृष्णदास प्रभु गिरिधर सुरत कंठ पत्र लिख्यो करज लेखनी पुन-पुन राधिका गुनी ॥२॥

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