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गावत मल्हार पिय आये मेरे आंगन

गावत मल्हार पिय आये मेरे आंगन कहा नौछावर करूँ यही ओसर ।
तन मन प्रान एक रोम पर वार डारुं तोऊ न करत या कृपा की सरवर ।। १ ।।

सुफल करी आज रेन किये अब सुख सेन मुख हू न आवे बेन उमग चल्यो हियो भर ।
रसिक प्रीतम प्रेम विवास भये श्री वल्लभ प्रभु रसिक पुरंदर ।। २ ।।

जागत रैंन गई, पिया बिन जागत रैंन गई

जागत रैंन गई, पिया बिन जागत रैंन गई।
अवधि वदी गए, अजहू न आये, बड़ी बेर भयीं॥१॥

कछु कहत हो, करत कछु और, कौन सीख दई।
सांच नही तेरो एको अंग, कहाँजू रीत लई॥२॥

कैसे कीजे विश्वास, भये हो विषई।
रसिक प्रीतम रावरी, छीन छीन गती नई॥३॥

लालन तो हो झूलो जो तुम

लालन तो हो झूलो जो तुम,
हौले हौले झूलावो।
डरपत हो घनश्याम मनोहर,
अपने कंठ लगायो॥१॥

हो उतरो तुम, झूलो मेरे मोहन,
जैसे जैसे गाँउ, तैसे तैसे गाओ।
रसिकप्रीतम पिय यह बिनती,
तनकी तपत बुजाओ॥२॥

हरियारो सावन आयो

हरियारो सावन आयो,
देखो माई, हरियारो सावन आयो।
हर्यो टिपारो शीश बिराजत,
काछ हरी मन भायो॥१॥

हरी मुरली है, हरी संग राधे,
हरी भूमि सुखदाई।
हरी हरी वन राजत द्रुमवेली,
न्रुत्यत कुंवर कन्हाई॥२॥

हरी हरी सारी सखीजन पहरे,
चोली हरिरंग भीनी।
रसिक प्रीतम मन हरित भयो है,
सर्वस्व न्योछावर कीनी॥३॥

सेन कामकी लायो,सो सावन आयो


सेन कामकी लायो,सो सावन आयो।
चल सखी झूलिये सुरंग हिंडोरे, कीजे श्याम मन भायो॥१॥
हाव भाव के खंभ मनोहर, कचघन गगन सुहायो।
काम नृपति वृषभान नंदिनी, रसिक रायवर पायो॥२॥

१ - पिय संग रंग भरि करि किलोलें

पिय संग रंग भरि करि किलोलें ।
सबन कों सुख देन पिय संग करत सेन,चित्त में परत चेन जब हीं बोलें ॥१॥
अति हि विख्यात सब बात इनके हाथ, नाम लेत कृपा करें अतोलें ।
दरस करि परस करि ध्यान हिय में धरें,सदा ब्रजनाथ इन संग डोलें ॥२॥
अतिहि सुख करन दुख सबके हरन,एही लीनो परन दे झकोले ।
ऐसी यमुने जान तुम करो गुनगान,रसिक प्रियतम पाये नग अमोले ॥३॥

Priyasang rangbari kari kalole, 
Sabanko sukhden, piyasadakkarat sen, chit me tub parat chain, jab hi bole, 
Atihi vikhiyaat, sab baat inke haat, naam lat krupakare atole, 
Daraskari paraskari dhyaan hiya mein darey, sada brijnath in sadak dole.
Atihi sukhkaran, dukh saban ke haran, ahee lino paran de jhakole 
Aisi yamune jaan tum karo gungaan, rasik priyatam paye nag amole.

२ - श्याम सुखधाम जहाँ नाम इनके

श्याम सुखधाम जहाँ नाम इनके ।
निशदिना प्राणपति आय हिय में बसे, जोई गावे सुजश भाग्य तिनके ॥१॥
येही जग में सार कहत बारंबार, सबन के आधार धन निर्धन के ।
लेत श्री यमुने नाम देत अभय पद दान, रसिक प्रीतम प्रिया बसजु इनके ॥२॥

Shyam sukhdham jahan naam inke, 
Nishdhin pranpati aye hiya mein base, johi gaawhe sujus bhagya tinke.
Yehi jag mein saar, kahat barambaar, saban ke aadhar dhan nirdhan ke lat shriyamune naam, det abhay pad dhan, rasik pritam priya basju inke.

३ - कहत श्रुतिसार निर्धार करिकें

कहत श्रुतिसार निर्धार करिकें ।
इन बिना कौन ऐसी करे हे सखी, हरत दुख द्वन्द सुखकंद बरखें ॥१॥
ब्रह्मसंबंध जब होत या जीव को, तबहि इनकी भुजा वाम फरकें ।
दौरिकरि सौरकर जाय पियसों कहे, अतिहि आनंद मन में जु हरखें ॥२॥
नाम निर्मोल नगले कोउ ना सके, भक्त राखत हिये हार करिकें ।
रसिक प्रीतम जु की होत जा पर कृपा, सोइ श्री यमुना जी को रूप परखें ॥३॥

Kahat shrutisaar nirdhar karike, 
In bina kaun aisi kare he sakhi, harat dukh dundh sukhkand barkhe.
Brahmasambandh jab hot ya jeev ko, tabhi inki buja baam farke, dorikari shorkar jaaye piyaso kahe, atihi anand manmeinju harke.
Naam nirmol nag le koho na sake, bhakt rakhat hiya haar karike,
Rasik Pritamjuki jot japar kripa, sohi ShriYamunaji ko rup parkhe.

४ - नैन भरि देखि अब भानु तनया

नैन भरि देखि अब भानु तनया ।
केलि पिय सों करें भ्रमर तबहि परें, श्रम जल भरत आनंद मनया ॥१॥
चलत टेढी होय लेत पिय को मोहि, इन बिना रहत नहिं एक छिनया ।
रसिक प्रीतम रास करत श्री यमुना पास, मानो निर्धनन की है जु धनया ॥२॥


Neinbar dekh aab banu tanya 
Keli Piyaso kare bramar tabhi pare, shramjal bharat anand manya.
Chalat tedi hoy let Piyako mohi, in bina rahat nahin ek chinya, 
Rasik Pritam raas karat ShriYamuna paas, mano nirdhan ki he ju dhanya.

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