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धूरि-भरे अति सोभित स्यामजू..

धूरि-भरे अति सोभित स्यामजू,  तैसी  बनी सिर सुन्दर चोटी ।
खेलत-खात फिरैं अंगनां,   पगपैजनी  बाजतीं,  पीरी  कछोटी ।। १ ।।
वा छबि कों रसखानि बिलोकत, बारत कामकलानिधि-कोटी ।
काग के भाग कहा कहिए,  हरी-हाथसों  लै  गयो माखन-रोटी ।। २ ।।

द्रौपदी औ गनिका, गज, गीध...

द्रौपदी औ गनिका, गज, गीध, अजामिलसों कियो सो न निहारो ।
गौतम-गेहिनी   कैसे  तरी,   प्रहलाद कौ  कैसे  हर्यौ  दुःख   भारो ।। १ ।।
काहे को सोच करै रसखानि,  कहा  करि  है   रवि-नन्द   विचारो ।
कौन की   संक   परी   है  जू   माखन-चाखनहारो  है   राखनहारो ।। २ ।। 

जा दिन तें निरख्यौ नंद-नंदन

जा दिन तें निरख्यौ नंद-नंदन, कानि तजि घर बंधन  छूट्यो ।
चारू बिलोकनि की निसी मार, संभार गयी  मन मारने लूट्यो ।। १ ।।
सागर कौ सरिता जिमि धावति  रोकी रहे कुल कौ पुल टूट्यो ।
मत्त भयो मन संग फिरै,   रसखानि सुरूप सुधा-रस   घूट्यो।। २ ।।

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