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सुंदर मुख पर वारो टोंना

सुंदर मुख पर वारो टोंना । 
बेनी बारन की मृदु वेना  ॥ १ ॥ 
खंजननयनन अंजन सोहे, भ्रोंहन लोयन लोना । 
तिरछी चितवन यों छबि लागे, कंजपलन अलिछोना ॥ २ ॥ 
जो छबि है वृषभानसुतामें, सो छबि नाहिन सोना । 
नंददास अविचल यह जोरी, राधास्याम सलोना ॥ ३ ॥

श्री यमुना जस जगत में जोइ गावे

श्री यमुना जस जगत में जोइ गावे ।
ताके अधीन ह्वै रहत हे प्राणपति
नैन अरु बेन में रस जु छावे ॥१॥

वेद पुराण की बात यह अगम हे,
प्रेम को भेद कोऊ न पावे ।
कहत गोविन्द श्री यमुने की जापर कृपा,
सोइ श्री वल्लभ कुल शरण आवे

भोग श्रृंगार यशोदा मैया

भोग श्रृंगार यशोदा मैया,श्री विट्ठलनाथ के हाथ को भावें
न्हवाय श्रृंगार करत हैं, आछी रुचि सों मोही पाग बंधावें ॥

तातें सदा हों उहां ही रहत हो, तू दधि माखन दूध छिपावें ।
छीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल, निरख नयन त्रय ताप नसावें ॥

आओ गोपाल श्रृंगार बनाऊ

आओ गोपाल श्रृंगार बनाऊ
विविध सुगंधन करो उबट्नो, पाछे उष्णजल ले जू न्हवावू ॥१॥


अंग अंगोछ गुहूं तेरी बेनी, फूलन रची रची भाल बनाऊ ।
सुरंग पाग जरतारी तोरा , रत्नखचित शिरपेच बंधाऊ ॥ २॥

वागो लाल सुनेरी छापो, हरी इजार चरनन विरचाऊ ।
पटुका सरस वैंजनी रंग को , हसली हार हमेल बनाऊ ॥ ३॥
गजमोतींन के हार मनोहर, वनमाला ले उर पहेराऊ ।
ले दर्पण देखो मेरे प्यारे , निरख निरख उर नयन सिराऊ ॥४॥

मधु मेवा पकवान मिठाई, अपने कर ले तुम्हे जिमाऊ ।
विष्णुदास को यह कृपाफल, बाललीला हो निसदीन गाऊँ ॥५॥

श्याम कहा चाहतसे डोलत

श्याम कहा चाहतसे डोलत ।
बूजे हुते वदन दूरावत , सुधे बोल ना बोलत ॥१॥

सुने निपट अंधीयारे मंदिर, दधी भाजनमें हाथ ।
अब काहे तुम उत्तर कर हो, कोऊ संग ना साथ ॥२॥

मैं जान्यो यह मेरो घर है , तिही धोखे में आयो ।
देखतही गोरस में चेंटी , काढ्नको कर नायो ॥३॥

सुनत चतुर वचन मोहनके , ग्वालिनी मूर मुस्कानी ।
परमानंद्प्रभू हो रतीनागर , सबे बात हम जानी ॥४॥

નંદ કહ્યો સુધિ ભલી દીવાઈ

ગોવર્ધન લીલાનું પદ

 નંદ   કહ્યો  સુધિ  ભલી  દીવાઈ,  મેં  તોં રાજકાજ મનલાઈ || ૧ ||
દિનપ્રતિ  કરત  યહે  અધમાઈ, કુલદેવતા સુરત વિસરાઈ || ૨ ||
કંસ દઈ  યહ   લોક  બડાઈ,   ગામદસક   સિરદાર   કહાઈ || ૩ ||
જલધિ બૂંદ જ્યોં જલધિ સમાઈ, માયા જહાંકી તહાં બિલાઈ || ૪ ||
સૂરદાસ   યહ   કહે  નંદરાઈ,  ચરણ  તુમ્હારે   સદા  સહાઈ || ૫ ||

નંદઘરની વ્રજ વધૂ બુલાઈ

ગોવર્ધન લીલાનું પદ

નંદ ઘરની વ્રજ  વધૂ  બુલાઈ,  યહ  સુનકૈ તુરત   હિ   સબ  આઈ || ૧ ||
કોન   કાજ   હમ   મહેરી   હંકારી, તુમ   નહિ  જાનત જોબનવારી || ૨ ||
વિહંસ કહત કહા દેત  હો   ગારી,   સુરપતિ   પૂજા   કરો   સંવારી || ૩ ||
દેખો   હમ   સબ   સુરત   વિસારી,   ઔરોં   હમ  હિ બૂઝિયે ગારી || ૪ ||
યહ સુન હરખત ભઈ નંદનારી, સખીયન બચન કહ્યો જબ પ્યારી || ૫ ||
સૂર  ઇન્દ્ર   પૂજા  અનુસારી,   તુરત   કરહુ   સબ   ભોગ   સંવારી || ૬ ||

આજ દિવારી મંગલ ચાર

આજ દિવારી મંગલ ચાર |
વ્રજ યુવતી મિલ મંગલ ગાવત ચોક પુરાવત આંગન દ્વાર || ૧ ||
મધુ મેવા પકવાન મીઠાઈ  ભરી ભરી   લીને   કંચન   થાર |
પરમાનંદદાસકો     ઠાકુર    પહેરે       આભૂષણ   સિંગાર  || ૨ ||

પ્રથમ ગોચરન ચલે કન્હાઈ

પ્રથમ ગોચારન ચલે કન્હાઈ |
માથે   મુકુટ  પીતામ્બરકી  છબી  વનમાલા પહરાઈ || ૧ ||
કુંડલ શ્રવણ કપોલ  બિરાજત  સુંદરતા  બનિ  આઈ |
ઘરઘરતે  સબ  છાક   લેત હૈ   સંગ   સખા સુખદાઈ || ૨ ||
આગે ધેનુ  હાંક  સબ  લીની  પાછે   મુરલી   બજાઈ |
પરમાનંદ પ્રભુ મનમોહન બ્રજબાસીન સુરત કરાઈ || ૩ ||

आज ललनकी होत सगाई

ब्याह और शेहराका पद

आज ललनकी होत सगाई |
आवोरी    गोपीजन    मिलकें     गावो     मंगल    चार   बधाई || १ ||
चोटी     चुपर     गुहूँ     सूत      तेरी      छान्ड़ो       चंचलताई |
वृषभान     गोप     टीको   दे   पठ्यो     सुन्दरजान     कन्हाई || २ ||
जो    तुमको     या    भान्त    देख   है   कर   हैं   कहा    बड़ाई |
पहर     बसन    आभूषण     सुन्दर     उनको     देऊ    दिखाई || ३ ||
नखशिख  अंग  शृंगार   महार  मन  मोतिनकी  माला  पहराई |
बैठे   आय   रत्न   चौकी   पर     नारिनकी     भीर       सुहाई  || ४ ||
विप्र प्रवीण  तिलक  कर मस्तक  अक्षत चांप  लियो  अपनाई  |
बाजत ढोल भेर  और  महुवर  नोबत   ध्वनि   घनघोर  बजाई || ५ ||
फूली   फिरत    यशोदारानी     वार    कुंवर   पर वसन   लुटाई |
परमानन्द   नन्दके   आंगन    अमरगण   पोहोपन    झरलाई || ६ ||

माई मेरो लाल दूल्हे बनी आयो

ब्याह और शेहरा के पद

माई मेरो लाल दूल्हे बनी आयो |
रत्नजटितको  सीस  शेहरो  हिरा  मोतिन   लाल जरायो || १ ||
नन्दरायको    कुंवर   कन्हैया   जसुमति   लाड   लड़ायो |
रसिक प्रीतमजूकी बानिक निरखत रोम रोम सुख पायो || २ ||

भोग सिंगार मैया सुनी मोकों

भोग सिंगार मैया सुनी  मोकों श्री विठ्ठलनाथ के हाथको भावै |
नीकें न्ह्वाई सिंगार करत है, आछी रुचिसों मोहिं पाग बंधावै || १ ||
तातें सदा हों उहांही रहत  हों ,  तू  डरी   माखन  दूध  छिपावै |
छीतस्वामी गिरिधर श्री विठ्ठल, निरखि नैन त्रय ताप नसावै || २ ||

बात हिलग की कासों कहिये...

बात हिलग की कासों कहिये |
सुनरी सखी व्यथा यातनकी समझ समझ मन चुप कर रहिये || १  ||
मरमी  विना  मरम को  जानें  यह  उपहास  जान  जग सहिये |
चतुर्भुज  प्रभु   गिरिधरन  मिलें  जब  तब  ही  सब  सुख  पैये || २  ||

मेरी अंखियोंमें न भरौ गुलाल लाल हों...

मेरी अंखियोंमें न भरौ गुलाल लाल हों तुम सौं बिनती करौं ।
मोपै सहयो न जाई गुलाल लाल हो
                            यह निपट कपट कों ख्याल लाल हो ।। १ ।।
हम अपने मन की  कहै   तुम सौ   तुम  गुपाल  लाल हो ।। २ ।।
रंग  जू  ठान्यौ अटपटो हम भई है रंगीली बाल  लाल हो ।। ३ ।।
चोवा चन्दन अरगजा हो केसरि  बहुत  गुलाल  लाल हो ।। ४ ।।
गागरि ढोरी ओचका हम  भई है  लाल  बिहाल  लाल हो ।। ५ ।।
मोहन मूर्ती साँवरो हो  रसिया   नन्द कों  लाल लाल हो ।। ६ ।।

वदत नाहिन ग्वालिनी जोबन के गारैं

वदत   नाहिन    ग्वालिनी     जोबन   के   गारैं ।
या  ब्रज   में   ऐंडी     फिरै    मन्मथ    उपचारें ।। १ ।।
पहिरै   रातो   पौंमचा    लहिंगा   हरि   किनारैं ।
अति रस तैं निकरी फिरैं   आचार   ढिंग   डारैं ।। २ ।।
नकवेसर    गजरा      बने     चौकी    खगवारे।
अंगियां खमकी   खयें  बनी  कुछ सुं   भरबारैं ।। ३ ।।
फुंफुंदी   डोरी के   झवा  सोहैं   फौंद    फुंदा  रैं ।
सोने  की    बाँकी   बिंदुली  ललित   लीला  रैं ।। ४ ।।
दीरघ  लोचन  छबि  छटा   कजरा   अनियारे ।
जगन्नाथ कविराई के प्रभु मोहि कान्हर कारे ।। ५ ।।

काजर वारी गोरी ग्वारि

काजर  वारी   गोरी   ग्वारि,    या   सांवलिया की    लगवारि ।
निसदिन रहत प्रेम रँग भीनीं,   हरि  रसिया  सौं  यारी  कीनीं ।। १ ।।

मदन गुपाल जानि रिझवारी,  नाना  बिधि के करती सिंगारी ।
मिलन काज रहै अंग  अँगोंछै,  सरस  सुगंधन  तेल  तिलोंछै ।। २ ।।

अंजन नांहिं  न भटु यह  दीये,  स्याम  रँग   नैंननि  में  पीये ।
गावति हु जसुमति गृह आवै ,   कृष्ण  चरित बहु गाई सुनावै ।। ३ ।।

सुंदर  स्याम  सुनै  ढिंग आई, चितवति ही चित हरि लै जाई ।
कोऊ कहे  काहू की  न  मानैं,   अपने  मन की  गाई   बखानै ।। ४ ।।

रामराई  प्रभु  यौं  समुझावै,  कही भगवान् कोऊ नीकैं  गावै ।
लखी इन स्याम कहै निरधार, इहि  लगवारनि वहि लगवार ।। ५ ।।

अरवीलो गरवीलो रंगीलो छबीलो कान्ह

अरवीलो गरवीलो  रंगीलो छबीलो कान्ह करि के सिंगार ठाढौ  देखो सखी कुँजद्वार ।
वाम भाग राधा प्यारी ओढ़े चुनरी की सारी  कंचुकी  उतंग गाढ़ी ठाडी बहियाँ गरे डार ।। १ ।।
चूनरी  चटकदार  पाग  सीस  नंदलाल   सूथन   चूनरी   बागौ   बन्यो   अंग   घेरदार ।। २ ।।
फूल-छरी  बेनु  धरी  बजत  है  रस भरी   सुनत  स्रवन  धाय   आये  सब  नर नगरा ।
निरखि मुखारविंद फूले   मानो   अरविंद   करत   गुंजार   तहाँ   'कृष्णदास'   भमरा ।। ३ ।।

प्रकटी सूरजसुता अधम उद्धारन को...

यमुनाजी की वधाई

प्रकटी सूरजसुता  अधम उद्धारन को, को कहे महिमा...को कहे महिमा जाकी ।
छठी उजेरी चैत्र मास की उपजी वेली उपजी वेली  सुधाकी ।। १ ।।
पटरानी, पटरानी, प्यारी सी यमुनाजी (२ )
श्री व्रजराज ललाकी..., रास विलास, रास विलास महासुख देनी...
रास विलास महासुख देनी... अदभुत केलि कला की  ।। २ ।।
अब हाँ हो ...  गंगं  गंरें गंरेंसां  गंमंपंगमंरें सां धपमग गपधनीनी धपगंगं  गंरें गंरेंसांनीसां
ईच्छाराम गिरिधर की जीवन... ईच्छाराम गिरिधर की जीवन..
शोभा,  शोभा श्री मथुरा मंडल की (२ )  ।। ३ ।।

निजजन निरख निरख सब फूले...

श्री आचार्यजी के पलना के पद : 

निजजन निरख निरख सब फूले।
श्री लक्ष्मण गृह आज भलो दिन, श्री वल्लभ पलना झूले ।। १ ।।
जो सुख नन्द यशोदा आंगन, गोपीजन  मिल   निरख्यो ।
सो अब दैवी जन के आंखन,  निरख  कमल पद हरख्यो ।। २ ।।
देत दान   कंचन   पट   भूषन,   याचक   भये    अजाची ।
कृष्णदास  आशा   विधना,  सब  किनी   मन की  सांची ।। ३ ।।

आज मोहि आगम अगम जनायो...

आज मोही आगम अगम जनायो ।
सोंधों छानी अरगजा  चंदन,   आंगन  भवन   लीपायों ।। १ ।।
आगम आवन  जान प्रीतम कों, गोपीजन मंगल गायो ।
आनंद उर न समाय सखी,  नव  साजि सिंगार बनायों ।। २ ।।
तन सुख पाग  पिछोरा   झीनो,   केसर   रंग    रंगायो ।
मुक्ता के  आभूषण  गुही  मनी,   पहिरावत हुलसायो ।। ३ ।।
पंखा  बहु  सिर  प्रीतम कों,   नित  राखुंगी  छिरकायों ।
ग्रीष्म ऋतु सुख देती नायक,  यह  औसर चली आयों ।। ४ ।।
आवेंगे  महेमान  आज  हरि,  भाग्य  बड़े  दिन  पायों ।
'कुंभनदास' नव नेह नई ऋतु, आगम सुजस सुनायों ।। ५ ।।

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