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लहेंकन लागी बसंत बहार सखी..

लहेंकन   लागी   बसंत   बहार   सखी,  त्यौं -त्यौं   बनवारी  लाग्यो   बहेकन |
फूल   पलास    नख    नाहर     केसें    तेसें,     कानन     लाग्यौं      महेकन || १  ||
कोकिल मोर सुक सारस हंस खंजन,मीन भ्रमर अँखियाँ देखि,अति ललकन |
नंददास   प्रभु   प्यारी  अगबानी,   गिरिधर  पिय कौं  देखती  भयौ  श्रमकन || २  ||

ससकि ससकि रही अपने भवन मैं

ससकि ससकि रही अपने भवन मैं चार जाम कौं कियो बिहार |
कब आवे मेरे घर   प्रीतम   बिधना   सौं   रही   अचरा   पसार || १  ||
अब   आई    बसंत     ऋतु     सजनी    मदन     राई    दरबार |
नंददास  प्रभु  रस  बस  कर  लीनो जाडो चल्यौं दौऊ कर झार || २  ||

प्रीतम को कछु दोष नहीं री..

प्रीतम को   कछु    दोष    नहीं   री,    आयो   सीत   बेरी   हमारो |
प्रीतम को मग जोवन कारन राखन नहीं देत वदन उधारो  सखी || १  || आयो...
सीतल  पवन  अकेली   जान कें  पठवत  आलस  करन   संभारो |
व्रत को   तजि   आकृत  निंद्रा  सों   मिली  ठगति  ठगारो  सखी || २  || आयो...
कहूँगी   जाए    जनाए    आज    मिले    मोसो    प्रीतम    प्यारो |
चतुरभुज  प्रभु  नेह   द्रोही    जाड़ा कों   कीजे  मुँह   कारो   सखी || ३  || आयो...

आज मदन महोत्सव राधा

आज मदन महोत्सव राधा |
मदन  गोपाल  बसंत  खेलत है   नागर  रूप   अगाधा || १  ||
निधि  बुधवार  पंचमी  मंगल  ऋतु  कुसुमाकर   आई |
जगत बिमोहन मकर ध्वज की जहाँ तहां फिरि दुहाई || २  ||
मन्मथ राज  सिंघासन  बैठे   तिलक  पिता  महदीनों |
छत्र चँवर  तूणीर  संखधुनी बिकट  चाप  कर   लीनों  || ३  ||
चलो सखी  तहां देखन  जैये    हरि  उपजावत    प्रीति |
परमानंददास  को  ठाकुर  जानत    है    सब     रीति || ४  || 

लाल गुपाल गुलाल हमारी आंखिन में जिन डारोजू

लाल  गुपाल  गुलाल   हमारी   आंखिन में  जिन  डारोजू ।
बदन   चंद्रमा  नैन   चकोरी   इन  अंतर   जिन   पारोजू ।। १  ।।
गाओ  राग   बसंत   परस्पर    अटपटे   खेल  निवारोजू ।
कुमकुम रंगसों भरी पिचकारी तकि नेनन जिन मारोजू ।। २  ।।
बंक विलोचन दु:ख के मोचन  भरिकें  दृष्टि  निहारोजू ।
नागरी नायक सब  सुखदायक   कृष्णदास कों  तारोजू  ।। ३  ।।

बसंत राजभोग खेल के पद

बसंत राजभोग खेल के पद

और राग सब भये बाराती दूल्हे राग बसंत ।
मदन महोच्छव आज सखी री बिदा भयौ हेमंत ।। १ ।।

मधुरे सूर कोकिल कल कूजत बोलति मोर हंसत ।
गावति नारि पंचम सूर ऊँचे जैसें पिक गुनवंत ।। २ ।।

हाथन   लई  कनक पिचकाई मोहन चाल चलन्ति ।
कुंभनदास स्यामा प्यारी कों मिल्यो हे भांमतो  कंत ।। ३ ।।

लाल गोपाल गुलाल हमारी आँखिन में जिन डारो जू

लाल गोपाल गुलाल हमारी आँखिन में जिन डारो जू।
बदन चन्द्रमा नैन चकोरी इन अन्तर जिन पारो जू ॥१॥
गावो राग बसन्त परस्पर अटपटे खेल निवारो जू।
कुमकुम रंग सों भरी पिचकारी तकि नैनन जिन मारो जू॥२॥
बंक विलोचन दुखमोचन लोचन भरि दृष्टि निहारो जू।
नागरी नायक सब सुख गायक कृष्णदास को तारो जू॥३॥

लाल ललित ललितादिक संग लिये

(उत्सव भोग आये तब)
लाल ललित ललितादिक संग लिये बिहरत वर वसन्त ऋतु कला सुजान।
फूलन की कर गेंदुक लिये पटकत पट उरज छिये हसत लसत हिलि मिलि सब सकल गुन निधान॥१॥
खेलत अति रस जो रह्यो रसना नहिं जात कह्यो निरखि परखि थकित भये सघन गगन जान।
छित स्वामी गिरिवरधर विट्ठल पद पद्म रेनु वर प्रताप महिमा ते कियो कीरति गान॥२॥

अद्भुत सोभा वृंदावन की देखो नंदकुमार

अद्भुत सोभा वृंदावन की देखो नंदकुमार।
कंत वसंत जानि आवत बन बेली कियो सिंगार॥१॥
पल्लव बरन बरन पहिरे तन बरन बरन फूले फूल।
ये तो अधिक सुहायो लागत मनि अभरन समतूल॥२॥
नंदनंदन विहंग अनंग भरी भाजत मनहुँ बधाई।
मंगल गीत गायवे को मानो कोकिल वधू बुलाई॥३॥
बहत मलय मारुत परचारग सबके मन संतोसे।
द्विज भोजन सोहत आलिंगन अधु मकरन्द परोसे॥४॥
सुनि सखी वचन गदाधर प्रभु के चलो सखी तहाँ जैये।
नवल निकुंज महल मंडप में हिलि-मिलि पंचम गैये॥५॥

आज कछु देखियत ओर ही बानक

(मंगला समय)
आज कछु देखियत ओर ही बानक प्यारी तिलक आधे मोती मरगजी मंग।
रसिक कुंवर संग अखारे जागी सजनी अधर्सुख निस बजावत उपंग॥१॥
नव निकुंज रंग मंडप में नृत्य भूमि साजि सेज सुरंग।
तापर विविध कल कूजित सखी सुनत श्रवन वन थकित कुरंग॥२॥
कृष्णदास प्रभु नटवर नागर रचत नयन रतिपति व्रत भंग।
मोहनलाल गोवर्धनधारी मोहि मिलन चलि नृत्य अनंग॥३॥

अष्टपदी – गुसांईं जी

हरिरिह ब्रजयुवतीश संगे।
विलसित करिणीगणवृतवारणवर इव रतिपतिमानभंगे॥
विभ्रमसंभ्रमलोलविलोचनसूचितसंचितभावं।
कापि दृगंचलकुवलयनिकरैरंचति तं कलरावं॥१॥
स्मितरुचिरुचिरतराननकमलमुदीच्य हरेरतिकंद।
चुंबति कापि नितंबवतीकरतलधॄतचिबुकमंदं॥२॥
उद्भटभावविभावितचापलमोहननिधुवनशाली।
रमयति कामपि पीनघन्स्तनविलुलितनववनमाली॥३॥
निजपरिरंभकृतेनुद्रुतमभिविक्ष्य हरिं सविलासं।
कामपि कापि बलादकरोदग्रेकुतुकेन सहासं॥४॥
कामपि नीवीबंध विमोकससंभ्रमलज्जितनयनां।
रमयति संप्रति सुमुखि बलादपि करतलधृतनिजवसनां॥५॥
प्रियपरिरंभविपुलपुलकावलि द्विगुणितसुभग शरीरा।
उद्यागति सखि कापि समं हरिणी रति रणधीरा॥६॥
विभ्रमसंभ्रमगलदंचलमलयांचितमंगमुदारं।
पश्यति सस्मितमपि विस्मितमनसा सुदृशः सविकारं॥७॥
चलति कयापि समं सकरग्रहमलसतरं सविलासं।
राधे तव पूरयतु मनोरथमुदितमिदं हरि रासं ॥८॥

अष्टपदी – जयदेव

विहरतिहरिरिह सरस वसंते।
नृत्यति युवति जनेन समंसखि विरहिजनस्य दुरंते॥
ललित लवंग लता परिशीलन कोमल मलय समीरे।
मधुकर निकर करंबित कोकिल कूजति कुंज कुटीरे॥१॥
उन्मद मदन मनोरथ पथिक वधू जन जनित विलापे।
अलिकुल संकुल कुसुम समूह निराकुल बकुल कलापे॥२॥
मृगमद सौरभरभवशं वदनवदलमाल तमाले।
युवजन हृदय विदारण मनसिजन खरुचिकिंशुकजाले॥३।
मदन महीपति कनक दंड रुचि केसर कुसुम विकासे।
मिलितशिलीमुख पाट्लपटल कृत स्मरतूणविलासे॥४॥
विगलित लज्जित जगदवलोकन तरुण करुण कृत हासे।
विरहि निकृंतनकुंतमुखाकृति केतकिदंतुरिताशे॥५॥
माधविकापरिमलललिते नवमालतिजाति सुगंधौ।
मुनि-मनसामपि मोहन कारिणि तरुणाकारणबंधौ॥६॥
स्फुटदतिमुक्तलतापरिरंभणमुकुलितपुलकितचूते।
वृन्दावनविपिने परिसरपरिगतयमुनाजलपूते॥७॥
श्री जयदेव भणितमिदमुदयति हरिचरण्स्मृतिसारं।
सरस वसंत समय वन वर्णन मनुगत मदन विकारं॥८॥

गोवर्धन की सिखर चारु पर फूली नव मधुरी जाय

गोवर्धन की सिखर चारु पर फूली नव मधुरी जाय।
मुकुलित फलदल सघन मंजरी सुमन सुसोभित बहुत भाय॥१॥
कुसुमित कुंज पुंज द्रुम बेली निर्झर झरत अनेक ठांय।
छीतस्वामी ब्रजयुवतीयूथ में विहरत हैं गोकुल के राय॥२॥

खेलत वसंत निस पिय संग जागी

मंगला दर्शन के समय
खेलत वसंत निस पिय संग जागी।
सखी वृंद गोकुल की सोभा गिरिधर पिय पदरज अनुरागी॥१॥
नवल कुंज में गुंजत मधुप पिक विविध सुगन्ध छींट तन लागी।
कृष्णदास स्वामिनी युवती यूथ चूडामणि रिझवत प्राणपति राधा बडभागी ॥२॥

आई ऋतु चहूँदिस फूले द्रुम कानन

भोग सरने के समय
आई ऋतु चहूँदिस फूले द्रुम कानन कोकिला समूह मिलि गावत वसंत हि।
मधुप गुंजारत मिलत सप्तसुर भयो है हुलास तन मन सब जंतहि॥१॥
मुदित रसिक जन उमगि भरे हैं नहिं पावत मन्मथ सुख अंतहि।
कुंभनदास स्वामिनी बेगि चलि यह समें मिलि गिरिधर नव कंतहि॥२॥

राधे जू आज बन्यो है वसंत

शयन भोग के समय
राधे जू आज बन्यो है वसंत।
मानो मदन विनोद विहरत नागरी नव कंत॥१॥
मिलत सन्मुख पाटली पट मत्त मान जुही।
बेली प्रथम समागम कारन मेदिनी कच गुही॥२॥
केतकी कुच कमल कंचन गरे कंचुकी कसी।
मालती मद विसद लोचन निरखि मुख मृदु हसी॥३॥
विरह व्याकुल कमलिनी कुल भई बदन विकास।
पवन पसरत सहचरी पिक गान हृदय विलास॥४॥
उत सखी चम्पक चतुर अति कदम नौतन माल।
मधुप मनिमाला मनोहर सूर श्री गोपाल॥५॥

रिंगन करत कान्ह आंगन में कर लीये नवनीत

(राजभोग समय)
रिंगन करत कान्ह आंगन में कर लीये नवनीत।
सोभित नील जलद तन सुन्दर पहरे झगुली पीत ॥१॥
रुनझुन रुनझुन नूपुर बाजे त्यों पग ठुमकि धरे।
कटि किंकनी कलराव मनोहर सुनि किलकार करे॥२॥
दुलरी कंठ कुंडल दोउ कानन दियो है कपोल दिठौना।
भाल विलास तिलक गोरोचन अलकावली अलि छोना॥३॥
लटकन लटकि रह्यो भुव ऊपर कुलह सुरंग बनी।
सिंहपौरी ते उझकि उझकि के छबि निरखत है सजनी॥४॥
नंदनंदन उन तन चितवत ही प्रेम मगन मन आई।
कंचन थार साजि घर घर ते बहु विधि भोजन लाई॥५॥
मनिमंदिर मूढा पै सुन्दरि आछे वसन बिछावें।
बालकृष्ण कों जो रुचि उपजै अपुने हाथ जिमावैं॥६॥
जल अचवाय वदन पोंछत और बीरी देत सुधारी।
हिये लगाय वदन  चुंबन करि सर्वसु डारत वारी॥७॥
नैनन अंजन दै लालन के मृगमद खोर करे।
सुरंग गुलाल लगाय कपोलन चिबुक अबीर भरे॥८॥
चोवा चंदन छिरकि अबीर गुलालन फैंट भराई।
तनक तनक सी मोहन को भरि देत कनक पिचकाई॥९॥
आपुस मांझ परस्पर छिरकत लालन पैं छिरकावै।
नैनी नैनी मुठी भराय रंगन सों सैनन नैन भरावै॥१०॥
निरखि निरखि फूलत नंदरानी तन मन मोद भरी।
नित प्रति तुम मेरे घर आओ मानों सुफल घरी॥११॥
देत असीस सकल ब्रजबनिता जसुमति भाग तिहारो।
कोटि बरस चिर जीयो यह ब्रज जीवन प्राण हमारो॥१२॥

श्री पंचमी परम मंगल दिन

श्री पंचमी परम मंगल दिन मदन महोत्सव आज ।
वसंत बनाय चली ब्रज सुंदरी ले पूजा को साज ॥१॥
कनक कलश जल पूरि पढति रति काम मंत्र रस मूल ।
तापे धरी रसाल मंजुरी ढांपि पीत दुकूल ॥२॥
चोवा चंदन अगर कुंकुमा नव केसरि घनसार ।
नाना धूप दीप नरांजन विविध भांति उपहार ॥३॥
वाजति ताल मृदंग मुरलिका बीना पटह उपंग ।
सरस वसंत मधुर सुर गावति उपजत तान तरंग ॥४॥
छिरकत अति अनुराग मुदित गोपीजन मदन गुपाल ।
मानो सुभग कनक कदली मंडल मधिराजति तरुन तमाल ॥५॥
यह विधि चलि ऋतुराज वधावन सकल घोष आनंद ।
हरिजीवन प्रभु गोवर्धनधर जय जय गोकुलचंद ॥६॥

साची कहो मनमोहन मोसों

साची कहो मनमोहन मोसों तो खेलों तुम संग होरी ।
आज की रेन कहा रहे मोहन कहां करी बरजोरी ॥१॥
मुख पर पीक पीठिपर कंकन हिये हार बिन डोरि ।
जिय में ओर उपर कछु औरे चाल चलत अछु औरि ॥२॥
मोहि बतावति मोहन नागर कहा मोहि जानत भोरी ।
भोर भये आये हो मोहन बात कहति कछु जोरी ॥३॥
सूरदास प्रभु ऐसी न कीजे आय मिलो कहा चोरी ।
मन माने त्यों करति नंदसुत अब आई है होरी ॥४॥

श्री गिरिधर लाल की बानिक ऊपर

श्री गिरिधर लाल की बानिक ऊपर आज सखी तृण टूटे री ।
चोवा चंदन अबीर कुंकुमा पिचकाइन रंग छूटे री ॥१॥
लाल के नैना रगमगे देखियत अंग अनंगन लूटे री ।
कृष्णदास धन्य धन्य राधिका अधर सुधा रस लूटे री ॥२॥

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