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वृन्दावन सघन कुंज

वृन्दावन  सघनकुंज,   माधुरी  लतानतर,   यमुना   पुलिन में,   मधुर    बाजी    बांसुरी ।
जबतें ध्वनी सुनी कान, मानों लागे मदनबाण, प्राणन हू की  कहा कहुं, पीर होत पासुंरी ।। १ ।।
व्याप्यो जो अनंग ताते,   अंग सुधि भूल गई,   कोऊ निंदो कोऊ वंदो,   करो   उपहासरी ।
ऐसे   व्रजाधिशजीसूं,   प्रीत   नई   रीत  बाढी,   जाके ह्रदय गड रही,   प्रेमपुंज   गांसरी ।। २ ।।

वृन्दावन सघन कुंज ...

उष्णकाल -कुंज के पद

वृंदावन  सघन  कुंज, माधुरी लतान तर, यमुना पुलिनमें, मधुर बाजी बांसुरी ।
जबतें  ध्वनी सुनी  कान , मानो  लागे  मदन बाण , प्राणन हूँ की कहा कहूँ, पीर होत  पांसुरी  ।। 1 ।।
व्याप्यो  जो अनंग  ताते, अंग  सुधि भूल  गई, कोऊ  निंदो  कोऊ  वंदो, करो  उपहासरी  ।
ऐसे  व्रजाधीशजीसूं, प्रीत  नई  रीत  बाढी, जाके हृदय  गड  रही, प्रेम पुंज  गांसरी  ।। 2 ।।

चलो सखी कुंज गोपाल जहां

चलो सखी कुंज गोपाल जहां ।
तेरी सों मदनमोहनपें, चल ले जाऊं तहां ।। 1 ।।
आछें कुसुम मंद मलयानिल, तरु कदम्ब की छांह ।
तहां निवास कियो नंदनंदन, चित तेरे मन मांह ।। 2 ।।
ऐसीरी बात सुनत व्रज सुंदर, तोहि रह्यो क्यों भावें ।
परमानंद स्वामी मनमोहन, भाग्य बड़े ते पावे ।। 3 ।।

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