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नख कहाँ लागे वन, वानरा लगाये नख

शृंगार औट-सन्मुख के पद


नख कहाँ लागे वन, वानरा  लगाये  नख,   चखक्यों  राते  प्रात,  देख्यो  ताते  भान को |
चन्दन लग्यो है कहाँ, विघ्न हरण पूजा कीनी, वंदन लग्यो है कहाँ, परस भयो थान को || १  ||
रैन  रहे  कहाँ,  नट  नृत्यत   जहाँ,   अरवरे   क्यों   बोलो  मोसों,   डर   भयो   आन को |
गुजरी  सो  गुजरी  अब,  आगें   आय  ठाडे सूर, थेगरी कहाँ लों देत, फाटे आसमान को || २  ||

सुमर मन गोपाललाल...

सुमर  मन  गोपाललाल, सुंदर अति रूपजाल, मिटे हैं जंजाल, निरखत सब गोपबाल  ।
मोर मुकुट सीस धरे, बनमाला सुभग गरे, सब को मन हरे देख, कुंडल की झलक गाल  ।। 1 ।।
आभूषण  अंग  सोहे,  मोतिन के  हार   पोहे,   कंठसरी   मोहे  द्रग,   गोपीन   निरखत   निहाल  ।
छीतस्वामी  गोवर्धनधारी,  कुंवर  नन्द सुवन, गायन के  पाछें  पाछें, धरत  हें  लटकीली  चाल  ।। 2 ।।

देखो माई सुन्दरता को रास

देखो माई सुन्दरता को रास ।
अति प्रवीण वृषभान नंदिनी, निरख बंधे दृगपास ।। 1 ।।
अंग अंग प्रति अमित माधुरी, भृकुटी मदन विलास ।
जबतें दृष्टि परी सुन्दर मुख, वश कीने अनायास ।। 2 ।।
प्रथम समागम कों सुन सजनी, उपजत है अति त्रास ।
अब तो मन वच क्रम सब दीनों, यह सुन सूरजदास ।। 3 ।।

देखो माई ये बडभागी मोर

देखो माई ये बडभागी मोर।
जिनकी पंख को मुकुट बनत है, शिर धरें नंदकिशोर॥१॥
ये बडभागी नंद यशोदा, पुन्य कीये भरझोर।
वृंदावन हम क्यों न भई हैं लागत पग की ओर॥२॥
ब्रह्मदिक सनकादिक नारद, ठाडे हैं कर जोर।
सूरदास संतन को सर्वस्व देखियत माखन चोरे॥३॥

गाय सब गोवर्धन तें आईं

गाय सब गोवर्धन तें आईं।
बछरा चरावत श्री नंदनंदन, वेणु बजाय बुलाई॥१॥
घेरि न घिरत गोप बालक पें, अति आतुर व्हे धाई।
बाढी प्रीत मदन मोहन सों, दूध की नदी बहाई ॥२॥
निरख स्वरूप ब्रजराज कुंवर को, नयनन निरख निकाई ।
कुंभनदास प्रभु के सन्मुख, ठाडी भईं मानो चित्र लिखाई॥३॥

वृंदावन क्यों न भये हम मोर

वृंदावन क्यों न भये हम मोर।
करत निवास गोवर्धन ऊपर, निरखत नंदकिशोर॥१॥
क्यों न भये बंसी कुल सजनी, अधर पीबत घनघोर।
क्यों न भये गुंजा बनवेली, रहत स्याम जु की ओर॥२॥
क्यों न भये मकराकृत कुंडल, स्याम श्रवन झकझोर।
परमानंद दास को ठाकुर गोपिन के चित्तचोर॥३॥

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