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फूल भवन में गिरिधर बैठे

फूल भवन में गिरिधर बैठे फूलन को शोभीत सिंगार।
फूलन को कटी बन्यो पिछोरा फूलन बांधे पेंच संवार ॥
फूलनकी बेनी जू बनी सीर फूलन के जू बने सब हार ।
फूलन के मुक्त छबी छाजत फूलन लटकन सरस संवार ॥
करन फूल फूलन कर पॉहोची गेंद फूल जल करत विहार ।
राधा माधो हसत परस्पर दास निरखत डारत तन वार ॥

सखी हों जो गई दधि बेचन व्रज

सखी हों जो गई दधि बेचन व्रज में उलटी आप बिकाई  री |
विन  ग्रथ  मोल  लई  नंदनंदन  सर्वस्व  लिख  दे आई री || १  ||
श्यामल  वरण  कमलदल  लोचन  पीताम्बर कटि फेंट री |
जब ते  आवत  सांकरी   खोरी   भई  हे  अचानक   भेट री || २  ||
कोनकी  हें   कोन    कुलबधू    मधुर   मधुर   हस   बोलेरी |
सकुच रही मोहि उत्तर नहीं आवत वल कर घूंघट खोले री || ३  ||
सास   नणद  उपचार  पचिहारी  काहू  मरम   न   पायो री |
कर गहि  वैद   ढन्ढोर  रहे  मोहि  चिंता    रोग   बतायो री || ४  ||
जा दिन  ते  में   सुरत  संभारी  गृह   अंगना  विष लागे री |
चितवत चलत सोवत और जागत यह  ध्यान मेरे आगें री || ५  ||
नीलमणि  मुक्ताफल  देहूं  जो   मोहि  श्याम   मिलायें री |
कहे   माधो  चिंता  क्यों  विसरे  बिन   चिंतामणि  पायें री || ६  ||

देखो देखो नैननि को सुख रथ बैठे हरि आज

देखो देखो नैननि को सुख रथ बैठे हरि आज ।
अग्रज अनुजा सहित स्याम घन सबै मनोरथ साज ॥१॥
हाटक कलसा ध्वजा पताका छत्र चंवर सिर ताज ।
तुरंग चाल अति चपल चलत हैं देखि पवन मन लाज ॥२॥
सुद आषाढ दोज शुभ दिन पुष्य नक्षत्र संयोग ।
बनमाला पीतांबर राजत धूप दीप बहु भोग ॥३॥

 गारी देत सबै मन भावत कीरति अगम अपार ।
मधोदास चरननि को सेवक जगन्नाथ श्रुतिसार ॥४॥

देखो देखो नैननि को सुख रथ बैठे हरि आज

देखो देखो नैननि को सुख रथ बैठे हरि आज ।
अग्रज अनुजा सहित स्याम घन सबै मनोरथ साज ॥१॥
हाटक कलसा ध्वजा पताका छत्र चंवर सिर ताज ।
तुरंग चाल अति चपल चलत हैं देखि पवन मन लाज ॥२॥
सुद आषाढ दोज शुभ दिन पुष्य नक्षत्र संयोग ।
बनमाला पीतांबर राजत धूप दीप बहु भोग ॥३॥
गारी देत सबै मन भावत कीरति अगम अपार ।
मधोदास चरननि को सेवक जगन्नाथ श्रुतिसार ॥४॥

श्री लछमन कुल चंद उदित जग उद्योतकारी

श्री लछमन कुल चंद उदित जग उद्योतकारी।
मात इलम्मा विमलराका उडुगन निजजन समाज पोषत पीयूष वचन हरियस उजियारी॥१॥
करुनामय निष्कलंक मायावाद तिमिर हरन सकल कला पूरन मन द्विजवपुधारी।
बलि बलि बलि माधोदास चरन कमल किये निवास भयो चकोर लोचन छबि निरखत गिरिधारी॥२॥

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