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तुम देखो माई आज नैन भर हरि जू के रथ की सोभा

तुम देखो माई आज नैन भर हरि जू के रथ की सोभा।

प्रात समय मनो उदित भयो रवि निरखि नयन अति लोभा ॥१॥

मनिमय जटित साज सरस सब ध्वजा चमर चित चोबा।
मदनमोहन पिय मध्य बिराजत मनसिज मन के छोभा ॥२॥

चलत तुरंग चंचल भू उपर कहा कहूं यह ओभा ।
आनंद सिंधु मानों मकर क्रीडत मगन मुदित चित चोभा ॥३॥

यह बिध बनी बनी ब्रज बीथन महियां देत सकल आनंद ।
गोविन्द प्रभु पिय सदा बसो जिय वृंदावन के चद ॥४॥

सुंदर बदनरी सुख सदन श्याम को

रथयात्रा के पद : व्रतोत्सव भावना

श्री गुसाईंजी वि. सं. 1616 को महासुद 13 के दिन जगदीश पधारें. वहां आप छ माह बिराजें. रथयात्रा का उत्सव उन्होंने वहीँ किया था. उसी समय भगवान जगदीश ने  पुष्टिमार्ग में रथयात्रा का उत्सव आरंभ करने की आज्ञा दी थी. उसी समय पीपली गाँव के माधवदास आपश्री के साथ थे. उन्होंने रथ की भावना के अनुसार पद गाया : "जय श्री जगन्नाथ हरि देवा ". इस पद को सून कर श्री गुंसाईजी प्रसन्न हुए और रथयात्रा के उत्सव में प्राथमिक पद के स्वरूपमें इस को अग्रस्थान दिया. और सूरदासजी के दो भावात्मक पदों 1. "वा पटपीत की फहेरान " 2. "सुंदर बदनरी सुख सदन श्याम को "भी स्थान दिया.

जब श्री गुंसाईजी अड़ेल पधारें तब रासा नामक सुथार के पास रथ सिद्ध कराके उसमें श्री नवनीतप्रिय प्रभु को पधराके रथयात्रा का उत्सव आषाढ़ सूद बीजको पुष्य नक्षत्र के समय को आरम्भ किया है.

सुंदर बदनरी सुख सदन श्याम को, निरख नैन मन थाक्यो  ।
हो ठाडी  विथन   व्हे  निकस्यो,  ऊझकि  झरोका  झांक्यो ।। 1 ।।
लालन एक चतुराई कीनी,   गेंद उछार गगन मिस ताक्यो ।
बेरिन   लाज    भईरी   मोकों,   में  गंवार   मुख   ढान्क्यो ।। 2 ।।
चितबन में कछु कर गयो मोतन, चढ्यो रहत चित चाक्यो ।
सूरदास   प्रभु   सर्वस्व   लेकें,  हंसत   हंसत   रथ   हांक्यो ।। 3 ।।

वा पट पीत की फहेरान

रथयात्रा के पद : व्रतोत्सव भावना

श्री गुसाईंजी वि. सं. 1616 को महासुद 13 के दिन जगदीश पधारें. वहां आप छ माह बिराजें. रथयात्रा का उत्सव उन्होंने वहीँ किया था. उसी समय भगवान जगदीश ने  पुष्टिमार्ग में रथयात्रा का उत्सव आरंभ करने की आज्ञा दी थी. उसी समय पीपली गाँव के माधवदास आपश्री के साथ थे. उन्होंने रथ की भावना के अनुसार पद गाया : "जय श्री जगन्नाथ हरि देवा ". इस पद को सून कर श्री गुंसाईजी प्रसन्न हुए और रथयात्रा के उत्सव में प्राथमिक पद के स्वरूपमें इस को अग्रस्थान दिया. और सूरदासजी के दो भावात्मक पदों 1. "वा पटपीत की फहेरान " 2. "सुंदर बदनरी सुख सदन श्याम को "भी स्थान दिया.

जब श्री गुंसाईजी अड़ेल पधारें तब रासा नामक सुथार के पास रथ सिद्ध कराके उसमें श्री नवनीतप्रिय प्रभु को  पधराके रथयात्रा का उत्सव आषाढ़ सूद बीजको पुष्य नक्षत्र के समय को आरम्भ किया है.

वा  पट पीत की  फहेरान  ।
कर गहि चक्र चरण की धावन, नहि विसरत वह बान ।। 1 ।।
रथतें उतर  अवनि  आतुरव्है,   कचरज की   लपटान ।
मानों  सिंह  शैलतें  उतर्यो,    महामत्त   गज   जान ।। 2 ।।
धन्य   गोपाल   मेरो प्रण राख्यो,   मेट वेद की कान ।
सोई अब सूर सहाय  हमारें,   प्रकट  भये  हरि  आन  ।। 3 ।।

जय श्री जगन्नाथ हरि देवा

रथयात्रा के पद : व्रतोत्सव भावना

श्री गुसाईंजी वि. सं. 1616 को महासुद 13 के दिन जगदीश पधारें. वहां आप छ माह बिराजें. रथयात्रा का उत्सव उन्होंने वहीँ किया था. उसी समय भगवान जगदीश ने  पुष्टिमार्ग में रथयात्रा का उत्सव आरंभ करने की आज्ञा दी थी. उसी समय पीपली गाँव के माधवदास आपश्री के साथ थे. उन्होंने रथ की भावना के अनुसार पद गाया : "जय श्री जगन्नाथ हरि देवा ". इस पद को सून कर श्री गुंसाईजी प्रसन्न हुए और रथयात्रा के उत्सव में प्राथमिक पद के स्वरूपमें इस को अग्रस्थान दिया. और सूरदासजी के दो भावात्मक पदों 1. "वा पटपीत की फहेरान " 2. "सुंदर बदनरी सुख सदन श्याम को "भी स्थान दिया.

जब श्री गुंसाईजी अड़ेल पधारें तब रासा नामक सुथार के पास रथ सिद्ध कराके उसमें श्री नवनीतप्रिय प्रभु को  पधराके रथयात्रा का उत्सव आषाढ़ सूद बीजको पुष्य नक्षत्र के समय को आरम्भ किया है.

जय श्री जगन्नाथ हरि देवा ।
रथ बैठे प्रभु अधिक बिराजत, जगत करत सब सेवा  ।। 1 ।।
सनक सनंदन ओर ब्रह्मादिक,  इन्द्रादिक जुर आये  ।
अपनी अपनी  भेट सबे ले,   गगन  विमानन  छाये  ।। 2 ।।
रत्नजटित रथ नीको लागत,  चंचल  अश्व  लगाये ।
नरनारी  आनंद  भये  अति,  प्रमुदित  मंगल  गायें  ।। 3 ।।
गारी देत दिवावत अपनपे, यह विधि रथहिं चलाये  ।
रामराय  श्री  गोवर्धनवासी,    नगर  उड़ीसा   आये  ।। 4 ।।

रथ चढि चलत जसोदा अंगना

रथ चढि चलत जसोदा अंगना ।
विविध सिंगार सकल अंग सोभित मोहत कोटि अनंगा ॥१॥
बालक लीला भाव जनावत किलक हँसत नंदनंदन ।
गरें बिराजत हार कुसुमन के चर्चित चोवा चंदन ॥२॥
अपने अपने गृह पधरावत सब मिलि ब्रजजुबतीजन ।
हर्षित अति अरपत सब सर्वसु वारत हैं तन मन धन ॥३॥
सब ब्रज दै सुख आवत घर कों करत आरती ततछन ।
रसिकदास हरि की यह लीला बसौ हमारे ही मन ॥४॥

ब्रज में रथ चढि चलेरी गोपाल

ब्रज में रथ चढि चलेरी गोपाल।
संग लिये गोकुल के लरिका बोलत वचन रसाल॥१॥
स्रवन सुनत गृह घ्रुह तें दौरी देखन को ब्रजबाल।
लेत फेरि करि हरि की बलैयाँ वारत कंचन माल॥२॥
सामग्री लै आवत सीतल लेत हरख नन्दलाल।
बांट देत और ग्वालन कों फूले गावत द्वाल॥३॥
जय जयकार भयो त्रिभुवन में कुरुम बरखत तिहिं काल।
देखि देखि उमगे ब्रजवासी सबै देत करताल॥४॥
यह बिधि बन सिंहद्वार जब आवत माय तिलक कर भाल।
लै उछंग पधरावत घर में चलत मंदगति चाल ॥५॥
करि नौछावरे अपने सुत की मुक्ताफल भरि थाल।
यह लीला रस रसिक दिवानिसि सुमिरन होत निहाल॥६॥

देखो देखो नैननि को सुख रथ बैठे हरि आज

देखो देखो नैननि को सुख रथ बैठे हरि आज ।
अग्रज अनुजा सहित स्याम घन सबै मनोरथ साज ॥१॥
हाटक कलसा ध्वजा पताका छत्र चंवर सिर ताज ।
तुरंग चाल अति चपल चलत हैं देखि पवन मन लाज ॥२॥
सुद आषाढ दोज शुभ दिन पुष्य नक्षत्र संयोग ।
बनमाला पीतांबर राजत धूप दीप बहु भोग ॥३॥
गारी देत सबै मन भावत कीरति अगम अपार ।
मधोदास चरननि को सेवक जगन्नाथ श्रुतिसार ॥४॥

तुम देखो माई आज नैन भर हरि जू के रथ की सोभा

तुम देखो माई आज नैन भर हरि जू के रथ की सोभा।
प्रात समय मनो उदित भयो रवि निरखि नयन अति लोभा ॥१॥
मनिमय जटित साज सरस सब ध्वजा चमर चित चोबा।
मदनमोहन पिय मध्य बिराजत मनसिज मन के छोभा ॥२॥
चलत तुरंग चंचल भू उपर कहा कहूं यह ओभा ।
आनंद सिंधु मानों मकर क्रीडत मगन मुदित चित चोभा ॥३॥
यह बिध बनी बनी ब्रज बीथन महियां देत सकल आनंद ।
गोविन्द प्रभु पिय सदा बसो जिय वृंदावन के चद ॥४॥

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