Showing posts with label नित्य सेवा. Show all posts
Showing posts with label नित्य सेवा. Show all posts
ઝારીજી ભરવા સમયે બોલવાનો શ્લોક
ઝારીજી ભરવા સમયે બોલવાનો શ્લોક :
પ્રિયારતિ શ્રમહરમ સુગન્ધિ પરિશીતલમ, યામુનમ વારિ પાત્રેસ્મિન ભવ શ્રી કૃષ્ણ તાપહૃત |
ઈદમપાનીય પાત્રમ હિ વ્રજનાથાય કલ્પિતમ, રાધાધરાત્મકત્વેન ભૂયાત તદુપમેવતત ||
ભાવાર્થ : (રાત્રિ વિહારમાં) પ્રિયાજી સાથેના સ્નેહને કારણે સ્મર
શ્રમ જલનું નિવારણ કરનાર, સુગંધિત તાપનાશક એવું શીતલ શ્રી યમુનાજલ આ
ઝારીજીરૂપી પાત્રમાં રહેલું આ જલ શ્રીકૃષ્ણના તાપનું નાશક થાઓ.
जय जय श्री वल्लभ प्रभु श्री विट्ठलेश साथे
जय जय श्री वल्लभ प्रभु श्री विट्ठलेश साथे। निज जन पर कर कॄपा धरत हाथ माथे।
दोस सबै दूर करत भक्तिभाव हृदय धरत काज सबै सरत सदा गावत गुन गाथे॥१॥
काहे को देह दमत साधन कर मूरख जन विद्यमान आनन्द त्यज चलत क्यों अपाथे।
रसिक चरन सरन सदा रहत है बडभागी जन अपुनो कर गोकुल पति भरत ताहि बाथे॥२॥
दोस सबै दूर करत भक्तिभाव हृदय धरत काज सबै सरत सदा गावत गुन गाथे॥१॥
काहे को देह दमत साधन कर मूरख जन विद्यमान आनन्द त्यज चलत क्यों अपाथे।
रसिक चरन सरन सदा रहत है बडभागी जन अपुनो कर गोकुल पति भरत ताहि बाथे॥२॥
श्री वल्लभ श्री वल्लभ श्री वल्लभ गुन गाऊँ
श्री वल्लभ श्री वल्लभ श्री वल्लभ गुन गाऊँ।
निरखत सुन्दर स्वरूप बरखत हरिरस अनूप द्विजवर कुल भूप सदा बल बल बल जाऊँ॥१॥
अगम निगन कहत जाहि सुरनर मुनि लहें न ताहि सकल कला गुन निधान पूरन उर लाऊँ।
गोविन्द प्रभु नन्दनन्दन श्री लछमन सुत जगत वंदन सुमिरत त्रयताप हरत चरन रेनु पाऊँ॥२॥
निरखत सुन्दर स्वरूप बरखत हरिरस अनूप द्विजवर कुल भूप सदा बल बल बल जाऊँ॥१॥
अगम निगन कहत जाहि सुरनर मुनि लहें न ताहि सकल कला गुन निधान पूरन उर लाऊँ।
गोविन्द प्रभु नन्दनन्दन श्री लछमन सुत जगत वंदन सुमिरत त्रयताप हरत चरन रेनु पाऊँ॥२॥
हों बलि जाऊं कलेऊ कीजे
हों बलि जाऊं कलेऊ कीजे।
खीर खांड घृत अति मीठो है अब को कोर बछ लीजे ॥१॥
बेनी बढे सुनो मनमोहन मेरो कह्यो जो पतीजे।
ओट्यो दूध सद्य धौरी की सात घूंट भरि पीजे ॥२॥
वारने जाऊं कमल मुख ऊपर अचरा प्रेम जल भीजे।
बहुर्यो जाइ खेलो जमुना तट गोविन्द संग करि लीजे ॥३॥
खीर खांड घृत अति मीठो है अब को कोर बछ लीजे ॥१॥
बेनी बढे सुनो मनमोहन मेरो कह्यो जो पतीजे।
ओट्यो दूध सद्य धौरी की सात घूंट भरि पीजे ॥२॥
वारने जाऊं कमल मुख ऊपर अचरा प्रेम जल भीजे।
बहुर्यो जाइ खेलो जमुना तट गोविन्द संग करि लीजे ॥३॥
जय जय श्री सूरजा कलिन्द नन्दिनी
जय जय श्री सूरजा कलिन्द नन्दिनी।
गुल्मलता तरु सुवास कुंद कुसुम मोद मत्त, गुंजत अलि सुभग पुलिन वायु मंदिनी॥१॥
हरि समान धर्मसील कान्ति सजम जलद नील, कटिअ नितंब भेदत नित गति उत्तंगिनी।
सिक्ता जनु मुक्ता फल कंकन युत भुज तरंग कमलन उपहार लेत पिय चरन वंदिनी॥२॥
श्री गोपेन्द्र गोपी संग श्रम जल कन सिक्त अंग अति तरंगिनी रसिक सुर सुफंदिनी।
छीतस्वामी गिरिवरधर नन्द नन्दन आनन्द कन्द यमुने जन दुरित हरन दुःख निकंदिनी ॥३॥
गुल्मलता तरु सुवास कुंद कुसुम मोद मत्त, गुंजत अलि सुभग पुलिन वायु मंदिनी॥१॥
हरि समान धर्मसील कान्ति सजम जलद नील, कटिअ नितंब भेदत नित गति उत्तंगिनी।
सिक्ता जनु मुक्ता फल कंकन युत भुज तरंग कमलन उपहार लेत पिय चरन वंदिनी॥२॥
श्री गोपेन्द्र गोपी संग श्रम जल कन सिक्त अंग अति तरंगिनी रसिक सुर सुफंदिनी।
छीतस्वामी गिरिवरधर नन्द नन्दन आनन्द कन्द यमुने जन दुरित हरन दुःख निकंदिनी ॥३॥
श्री जमुना जी दीन जानि मोहिं दीजे
श्री जमुना जी दीन जानि मोहिं दीजे।
नंदकुमार सदा वर मांगों गोपिन की दासी मोहि कीजे ॥१॥
तुम तो परम उदार ख्रुपा निधे चरन सरन सुखकारी।
तिहारे बस सदा लाडिली वर तट क्रीडत गिरिधारी॥२॥
सब ब्रजजन विहरत संग मिलि अद्भुत रास विलासी ।
तुम्हारे पुलिन निकट कुंजने द्रुम कोमल ससी सुबासी ॥३॥
ज्यों मंडल में चंद बिराजत भरि भरि छिरकत नारी ।
हँसत न्हात अति रस भरि क्रीडत जल क्रीडा सुखकारी ॥४॥
रानी जू के मंदिर में नित उठि पाँय लागि भवन काज सब कीजे ।
परमानन्ददास दासी व्है नन्दनन्दन सुख दीजे ॥५॥
नंदकुमार सदा वर मांगों गोपिन की दासी मोहि कीजे ॥१॥
तुम तो परम उदार ख्रुपा निधे चरन सरन सुखकारी।
तिहारे बस सदा लाडिली वर तट क्रीडत गिरिधारी॥२॥
सब ब्रजजन विहरत संग मिलि अद्भुत रास विलासी ।
तुम्हारे पुलिन निकट कुंजने द्रुम कोमल ससी सुबासी ॥३॥
ज्यों मंडल में चंद बिराजत भरि भरि छिरकत नारी ।
हँसत न्हात अति रस भरि क्रीडत जल क्रीडा सुखकारी ॥४॥
रानी जू के मंदिर में नित उठि पाँय लागि भवन काज सब कीजे ।
परमानन्ददास दासी व्है नन्दनन्दन सुख दीजे ॥५॥
अधम उद्धारनी मैं जानी, श्री जमुना जी
अधम उद्धारनी मैं जानी, श्री जमुना जी।
गोधन संग स्यामघन सुन्दर तीर त्रिभंगी दानी॥१॥
गंगा चरन परस तें पावन हर सिर चिकुर समानी।
सात समुद्र भेद जम-भगिनी हरि नखसिख लपटानी॥२॥
रास रसिकमनि नृत्य परायन प्रेम पुंज ठकुरानी ।
आलिंगन चुंबन रस बिलसत कृष्ण पुलिन रजधानी ॥३॥
ग्रीष्म ऋतु सुख देति नाथ कों संग राधिका रानी।
गोविन्द प्रभु रवि तनया प्यारी भक्ति मुक्ति की खानी ॥४॥
गोधन संग स्यामघन सुन्दर तीर त्रिभंगी दानी॥१॥
गंगा चरन परस तें पावन हर सिर चिकुर समानी।
सात समुद्र भेद जम-भगिनी हरि नखसिख लपटानी॥२॥
रास रसिकमनि नृत्य परायन प्रेम पुंज ठकुरानी ।
आलिंगन चुंबन रस बिलसत कृष्ण पुलिन रजधानी ॥३॥
ग्रीष्म ऋतु सुख देति नाथ कों संग राधिका रानी।
गोविन्द प्रभु रवि तनया प्यारी भक्ति मुक्ति की खानी ॥४॥
यह प्रसाद हों पाऊं श्री यमुना जी
यह प्रसाद हों पाऊं श्री यमुना जी।
तिहारे निकट रहों निसिबासर राम कृष्ण गुण गाऊँ॥१॥
मज्जन करों विमल जल पावन चिंता कलह बहाऊं।
तिहारी कृपा तें भानु की तनया हरि पद प्रीत बढाऊं॥२॥
बिनती करों यही वर मांगो, अधमन संग बिसराऊं।
परमानंद प्रभु सब सुख दाता मदन गोपाल लडाऊं॥३॥
तिहारे निकट रहों निसिबासर राम कृष्ण गुण गाऊँ॥१॥
मज्जन करों विमल जल पावन चिंता कलह बहाऊं।
तिहारी कृपा तें भानु की तनया हरि पद प्रीत बढाऊं॥२॥
बिनती करों यही वर मांगो, अधमन संग बिसराऊं।
परमानंद प्रभु सब सुख दाता मदन गोपाल लडाऊं॥३॥
साँझ के साँचे बोल तिहारे
साँझ के साँचे बोल तिहारे।
रजनी अनत जागे नंदनंदन आये निपट सवारे॥१॥
अति आतुर जु नीलपट ओढे पीरे बसन बिसारे।
कुंभनदास प्रभु गोवर्धनधर भले वचन प्रतिपारे॥२॥
रजनी अनत जागे नंदनंदन आये निपट सवारे॥१॥
अति आतुर जु नीलपट ओढे पीरे बसन बिसारे।
कुंभनदास प्रभु गोवर्धनधर भले वचन प्रतिपारे॥२॥
लालन तहिं जाहु जाके रस लंपट अति
लालन तहिं जाहु जाके रस लंपट अति।
अति अलसाने नैन देखियत प्रगट करत प्यारी रति॥१॥
अधर दसन छत वसन पीक सह अरु कपोल श्रम बिंदु देखियति।
नख लेखनि तन लखी स्याम पट जय पताक रन जीतिय रतिपति॥२॥
कितव वाद तजो पिय हम सों जैसो तन स्याम तेसोई मन अति।
गोविन्द प्रभु पिय पाग संवरहु गिरत कुसुम सिर मालति ॥३॥
अति अलसाने नैन देखियत प्रगट करत प्यारी रति॥१॥
अधर दसन छत वसन पीक सह अरु कपोल श्रम बिंदु देखियति।
नख लेखनि तन लखी स्याम पट जय पताक रन जीतिय रतिपति॥२॥
कितव वाद तजो पिय हम सों जैसो तन स्याम तेसोई मन अति।
गोविन्द प्रभु पिय पाग संवरहु गिरत कुसुम सिर मालति ॥३॥
जानि पाये हो ललना
जानि पाये हो ललना ।
बलि बलि ब्रजनृप कुंवर जाके बिविसन सब निस जागे अब तहीं अनुसर॥१॥
अपनी प्यारी के रति चिन्ह हमहिं दिखावन आये देत लोंन दाधे पर।
गोविन्द प्रभु स्यामल तन तैसेई हो मन जनम हि ते जुवतिन प्रान हर ॥२॥
बलि बलि ब्रजनृप कुंवर जाके बिविसन सब निस जागे अब तहीं अनुसर॥१॥
अपनी प्यारी के रति चिन्ह हमहिं दिखावन आये देत लोंन दाधे पर।
गोविन्द प्रभु स्यामल तन तैसेई हो मन जनम हि ते जुवतिन प्रान हर ॥२॥
करत कलेऊ दोऊ भैया
मंगल भोग सरावे के पद
करत कलेऊ दोऊ भैया।
रोटी तोर सान माखन में मिश्री मेल खवावत मैया॥१॥
काचो दूध सद्य धौरी को तातोकर मथ पयावत घैया ।
कर अचवन बीरा ले ब्रजपति पाछे चले चरावन गैया ॥२॥
करत कलेऊ दोऊ भैया।
रोटी तोर सान माखन में मिश्री मेल खवावत मैया॥१॥
काचो दूध सद्य धौरी को तातोकर मथ पयावत घैया ।
कर अचवन बीरा ले ब्रजपति पाछे चले चरावन गैया ॥२॥
मंगल मंगलम् ब्रज भुवि मंगलं
मंगल मंगलम् ब्रज भुवि मंगलं।
मंगल मिह श्री नंद यशोदा नाम सुकीर्तन मेंतद्रुचिरोत्संगसुंलालित पालित रूपं॥१॥
श्री श्री कृष्ण इति श्रुतिसारं नाम स्वार्त जनाशय तापापहमिति मंगलरावं।
ब्रजसुंदरीवयस्य सुरभीवृंद मृगीगण निरूपम् भावाः मंगल सिंधुचया य॥२॥
मंगलमीषत्स्मितयुमीक्षण भाषणमुन्नत नासापुट्गत मुक्ताफल चलनं ।
कोमल चलदंगुलिदल संगत वेणुनिनाद विमोहित वृंदावन भुवि जाताः॥३॥
मंगल मखिलं गोपीशितुरिति मंथरगति विभ्रम मोहित रासस्थितगानं ।
त्वं जय सततं श्रीगोवर्धनधर पालय निजदासान्॥४॥
मंगल मिह श्री नंद यशोदा नाम सुकीर्तन मेंतद्रुचिरोत्संगसुंलालित पालित रूपं॥१॥
श्री श्री कृष्ण इति श्रुतिसारं नाम स्वार्त जनाशय तापापहमिति मंगलरावं।
ब्रजसुंदरीवयस्य सुरभीवृंद मृगीगण निरूपम् भावाः मंगल सिंधुचया य॥२॥
मंगलमीषत्स्मितयुमीक्षण भाषणमुन्नत नासापुट्गत मुक्ताफल चलनं ।
कोमल चलदंगुलिदल संगत वेणुनिनाद विमोहित वृंदावन भुवि जाताः॥३॥
मंगल मखिलं गोपीशितुरिति मंथरगति विभ्रम मोहित रासस्थितगानं ।
त्वं जय सततं श्रीगोवर्धनधर पालय निजदासान्॥४॥
मंगल माधो नाम उचार
मंगल माधो नाम उचार।
मंगल वदन कमल कर मंगल मंगल जन की सदा संभार ॥१॥
देखत मंगल पूजत मंगल गावत मंगल चरित उदार ।
मंगल श्रवण कथा रस मंगल मंगल तनु वसुदेव कुमार ॥२॥
गोकुल मंगल मधुवन मंगल मंगल रुचि वृंदावन चंद ।
मंगल करत गोवर्धनधारी मंगल वेष यशोदा नंद॥३॥
मंगल धेनु रेणु भू मंगल मंगल मधुर बजावत बेन।
मंगल गोप वधू परिरंभण मंगल कालिंदी पय फेन ॥४॥
मंगल चरण कमल मुनि वंदित मंगल की रति जगत निवास ।
अनुदिन मंगल ध्यान धरत मुनि मंगल मति परमानंद दास ॥५॥
मंगल वदन कमल कर मंगल मंगल जन की सदा संभार ॥१॥
देखत मंगल पूजत मंगल गावत मंगल चरित उदार ।
मंगल श्रवण कथा रस मंगल मंगल तनु वसुदेव कुमार ॥२॥
गोकुल मंगल मधुवन मंगल मंगल रुचि वृंदावन चंद ।
मंगल करत गोवर्धनधारी मंगल वेष यशोदा नंद॥३॥
मंगल धेनु रेणु भू मंगल मंगल मधुर बजावत बेन।
मंगल गोप वधू परिरंभण मंगल कालिंदी पय फेन ॥४॥
मंगल चरण कमल मुनि वंदित मंगल की रति जगत निवास ।
अनुदिन मंगल ध्यान धरत मुनि मंगल मति परमानंद दास ॥५॥
मंगल रूप यशोदानंद
मंगल रूप यशोदानंद ॥
मंगल मुकुट कानन में कुंडल मंगल तिलक बिराजत चंद ॥१॥
मंगल भूषण सब अंग सोहत मंगल मूरति आनंद कंद ॥
मंगल लकुट कांख में चांपे मंगल मुरली बजावत मंद ॥२॥
मंगल चाल मनोअहर मंगल दरशन होत मिटत दुःख द्वंद ॥
मंगल ब्रजपति नाम सबन को मंगल यश गावत श्रुति छंद ॥३॥
मंगल मुकुट कानन में कुंडल मंगल तिलक बिराजत चंद ॥१॥
मंगल भूषण सब अंग सोहत मंगल मूरति आनंद कंद ॥
मंगल लकुट कांख में चांपे मंगल मुरली बजावत मंद ॥२॥
मंगल चाल मनोअहर मंगल दरशन होत मिटत दुःख द्वंद ॥
मंगल ब्रजपति नाम सबन को मंगल यश गावत श्रुति छंद ॥३॥
रत्न जटित कनक थाल मध्य सोहे दीप माल
रत्न जटित कनक थाल मध्य सोहे दीप माल अगर आदि चंदन सों अति सुगंध मिलाई ॥
घनन घनन घंटा घोर झनन झनन झालर झकोर ततथेई ततथेई बोले सब ब्रज की नारी सुहाई ॥१॥
तनन तनन तान मान राग रंग स्वर बंधान गोपी सब गावत हैं मंगल बधाई॥
चतुर्भुज गिरिधरन लाल आरती बनी रसाल तनमनधन वारत हैं जसोमति नंदराई ॥२॥
घनन घनन घंटा घोर झनन झनन झालर झकोर ततथेई ततथेई बोले सब ब्रज की नारी सुहाई ॥१॥
तनन तनन तान मान राग रंग स्वर बंधान गोपी सब गावत हैं मंगल बधाई॥
चतुर्भुज गिरिधरन लाल आरती बनी रसाल तनमनधन वारत हैं जसोमति नंदराई ॥२॥
मंगल आरती कीजे भोर
मंगल आरती कीजे भोर ॥
मंगल जन्म कर्म गुण मंगल मंगल यशोदा माखन चोर ॥१॥
मंगल वेणु मुकुट गुण मंगल मंगल रूप रमे मनमोर ॥
जन भगवान जगत में मंगल मंगल राधायुगलकिशोर ॥२॥
मंगल जन्म कर्म गुण मंगल मंगल यशोदा माखन चोर ॥१॥
मंगल वेणु मुकुट गुण मंगल मंगल रूप रमे मनमोर ॥
जन भगवान जगत में मंगल मंगल राधायुगलकिशोर ॥२॥
नागरी नंदलाल संग रंग भरी राजें
नागरी नंदलाल संग रंग भरी राजें ॥
श्याम अंस बाहु दिये कुंवरि पुलक पुलक हिये मंद मंद हसन प्रियें कोटि काम लाजें॥१॥
तरुतमाल श्यामलाल लपटी अंग अंग वेलि निरख सखी छबि सुकेलि नूपुर कल बाजें ॥
दामोदर हित सुदेश शोभित सुंदर सुवेश नवल कुंज भ्रमर पुंज कोकिल कल गाजें ॥२॥
श्याम अंस बाहु दिये कुंवरि पुलक पुलक हिये मंद मंद हसन प्रियें कोटि काम लाजें॥१॥
तरुतमाल श्यामलाल लपटी अंग अंग वेलि निरख सखी छबि सुकेलि नूपुर कल बाजें ॥
दामोदर हित सुदेश शोभित सुंदर सुवेश नवल कुंज भ्रमर पुंज कोकिल कल गाजें ॥२॥
श्रीनाथ जी को ध्यान मेरे निशदिनारी माई
श्रीनाथ जी को ध्यान मेरे निशदिनारी माई । मेरे मन के मेहेल प्रीतिकुंज जामे जादोराई ।
शामरे बरन कोमल चरन नख देखे चकचोंधी होत, पायन उपर पेंजनी सो विविध जो बनाई ॥१॥
दाहिने पद पद्म आली ताते पग टेढो धरत ऐसे चरण सुख करण है सदा दुखदाई ॥
वनमाल मुक्तामाल, कंठ बनी कौस्तुभमणि, पीतांबर की चटक तामे दामिनी छबी छाई ॥२॥
बाजूबंद मुद्रिका बनी नगकी अति चमत्कार अरुण अधर मुरली मधुरेसुर वजाई ॥
कमल नयन कुंडल कांति ग्रीवा प्रतिबिंब होत, आनंद भर्यो मुखारविंद रह्यो मुसकाई ॥३॥
मोरमुकुट लटकचटक घूंघरवारे अलकझलक , किये चंदनखोर डगमगी चाल सुंदरताई ।
कहि भगवान हित रामरायप्रभु निरख भयो बिहाल श्रीगुपाल रसना रटलाई ॥४॥
शामरे बरन कोमल चरन नख देखे चकचोंधी होत, पायन उपर पेंजनी सो विविध जो बनाई ॥१॥
दाहिने पद पद्म आली ताते पग टेढो धरत ऐसे चरण सुख करण है सदा दुखदाई ॥
वनमाल मुक्तामाल, कंठ बनी कौस्तुभमणि, पीतांबर की चटक तामे दामिनी छबी छाई ॥२॥
बाजूबंद मुद्रिका बनी नगकी अति चमत्कार अरुण अधर मुरली मधुरेसुर वजाई ॥
कमल नयन कुंडल कांति ग्रीवा प्रतिबिंब होत, आनंद भर्यो मुखारविंद रह्यो मुसकाई ॥३॥
मोरमुकुट लटकचटक घूंघरवारे अलकझलक , किये चंदनखोर डगमगी चाल सुंदरताई ।
कहि भगवान हित रामरायप्रभु निरख भयो बिहाल श्रीगुपाल रसना रटलाई ॥४॥
Subscribe to:
Posts (Atom)
Featured Post
શ્રીકૃષ્ણ: શરણં મમ:
શ્રીકૃષ્ણ: શરણં મમ:… શ્રીકૃષ્ણ: શરણં મમ: શ્રીકૃષ્ણ: શરણં મમ:… શ્રીકૃષ્ણ: શરણં મમ: કદંબ કેરી ડાળો બોલે શ્રીકૃષ્ણ: શરણં મમ: જનુમા કેરી પ...