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तुमकों टेर टेर मैं हारी...

तुमकों  टेर टेर मैं  हारी ।
कहांजो  रहे, अबलो  मनमोहन, लेहोन  छाक  तुम्हारी  ।। 1 ।।
भूल   परी    मारग   में,   क्योंहूँ     न      पेंड़ो    पायो  ।
बूझत  बूझत, यहाँ  लो  आई,  तब  तुम  वेणु  बजायो  ।। 2 ।।
देखो मेरे  अंग  के    पसीना,   उर को   अंचल    भीनो  ।
परमानंद प्रभु, प्रीति  जान कें, धाय  आलिंगन  कीन्हों  ।। 3 ।।

कांवर द्वय भरकें छाक...

कांवर  द्वय  भरकें  छाक,  पठाई  नंदरानी,    आप  मोहि   मिले   मारगमें,    मधुबन के   कूल  |
सुबल  तोक  तरुण  वेष,  आवत  कछु भोजन  लिये, चंचल  गति  चलत  दोउ, दरसन  के  फूल  || १ || 
कनक थार पीरे   जगमगात,    बेलन की    भातकांति,    भरे  हैं  नंदरानी,    आप दोउ  समतूल  |
पचरंग  पाट की   डोरी,   चोसर  चहुं ओर  खचित,  पवन  गवन बिकस   जात,   रेसम के  झूल  || २ ||
छोटी  छोटी  द्वय  गांठ, तामें  पठवन  सब  व्रजजन की,  आसपास  लटक रहे,  फोंदा मखतूल  |
सकल    पाक    परमानंद,    आरोगत     परमानंद,   परमानंद  जानत   सब,   बातन को   मूल  || ३ ||

घरतें छाक ले आई ग्वालन

घरतें  छाक  ले  आई  ग्वालन  ।
दूरतें      ग्वालिन,    मोहन      देखी,    नेनन     सेन     बुलाई  ।। 1 ।।
सखा    संग   कोऊ    नहीं   स्याम  के,   गये    चरावन     गाई  ।
जब   एकांत,   देख   मोहन को,   ग्वालिनी    मन     मुसिकाई  ।। 2 ।।
दोउ   हिलमिल    छाक    अरोगत,    बैठ    कदम  की     छाँही  ।
रहस्य    निकुंज,    भवन की  लीला,   का पे    बरनी   न  जाई  ।। 3 ।।
सिव   सनकादिक    नारद    सारद,   उनहु    न   देत   दिखाई  ।
हरिनारायण  श्यामदास के   प्रभु  माई, गोपी  महा निधि  पाई  ।। 4 ।।

ग्वालिन घरतें कौन बुलाई...


ग्वालिन  घरतें   कौन  बुलाई ।
जाय  जिमावो, अपने  पतिको, यहां   क्योंरी   तुम    आई  ।। 1 ।।
यह    मर्यादा   वेदकी    नाहीं,   करो  अपनी    मन   भाई  ।
निज  पति छांड, औरनको  चाहत, यह  तुम  कौन  बताई  ।। 2 ।।
दीन  बचन  ग्वालिन बोली  हम,  सुत  पति  छांडके आई  ।
जान्यो,   मनमोहन,   भूखे हैं,   अखिल     लोकके    राई  ।। 3 ।।
बचन  सुनत  मोहन  मुस्काने,   कर   गहि  हृदे   लगाई  ।
दोउ संग  मिली, छाक अरोगत, 'दास' निरख बलि  जाई  ।। 4 ।। 

गोविंद लीजै छाक तिहारी

गोविंद लीजै छाक तिहारी ।
भई बड़ी बेर, बैठी मग चितवत, रसना टेरत हारी ।। 1 ।।
बहु बिंजन पकवान मिठाई, तुम लायक रुचिकारी ।
कीनी भली तुम, आई गोपीजन, भूख लगी अति भारी ।। 2 ।।
जमुना तीर कदमकी छैया, मंडल रचना कीनी ।
चत्रभुज प्रभु, गिरिधरन लाल तब, छाक बाँट सब लीनी ।। 3 ।।

भोजन करत नंदलाल, संग लिये व्रजबाल

भोजन करत नंदलाल, संग लिये व्रजबाल,
बैठे हैं कालिंदी कुल, चंचल नैन बिसाल ।
छाक भरि लाई थाल, परसपर करत ख्याल,
हंसी हंसी चुंबत गाल, बोलत बचन रसाल ।। 1 ।।
आसपास बैठे, वाम मधि मोहे, घनश्याम जैंवत,
सुख के धाम, रस भरे रसिक लाल ।
विमल चरित करत गान, आज्ञा भई कुंवर कान्ह,
दास कुंभन गावत राग मलार, निरखि भये निहाल ।। 2 ।।


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