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मात जशोदा परव मनावे

मात   जशोदा  परव  मनावे |
भोगी के   दिन   तिल    लडुवा    ले    लालनकोंजू     जिमावे || १  ||
गोद  बेठाय   निहारत  सुत  मुख   नानाविध  के दान  दिवावे |
कुंभनदास प्रभु गोवरधनधर   निरख निरख सब ही सुख पावे || २  ||

मात जशोदा परव मनावे

मात   जशोदा  परव  मनावे |
भोगी के   दिन   तिल    लडुवा    ले    लालनकोंजू     जिमावे || १  ||
गोद  बेठाय   निहारत  सुत  मुख   नानाविध  के दान  दिवावे |
कुंभनदास प्रभु गोवरधनधर   निरख निरख सब ही सुख पावे || २  ||

तरणि तनया तीर आवत हें प्रात समे गेंद खेलत

तरणि तनया तीर आवत हें प्रात समे गेंद खेलत देख्योरी आनंद को कंदवा।
काछिनी किंकणि कटि पीतांबर कस बांधे लाल उपरेना शिर मोरन के चंदवा॥१॥
पंकज नयन सलोल बोलत मधुरे बोल गोकुल की सुंदरी संग आनंद स्वछंदवा।
कृष्णदास प्रभु गिरिगोवर्धनधारी लाल चारु चितवन खोलत कंचुकी के बंदवा॥२॥

ग्वालिन मेरी गेंद चुराई

ग्वालिन मेरी गेंद चुराई।
खेलत आन परी पलका पर अंगिया मांझ दुराई॥१॥
भुज पकरत मेरी अंगिया टटोवत छुवत छंतिया पराई।
सूरदास मोही एही अचंबो एक गई द्वय पाई॥२॥

पतंग की गुडी उडावन लागे व्रजबाल

पतंग की गुडी उडावन लागे व्रजबाल॥
सुंदर पताका बांधे मनमोहन बाजत मोरन के ताल॥१॥
कोउ पकरत कोउ खेंचत कोउ चंचल नयन विशाल।
कोउ नाचत कोउ करत कुलाहल कोउ बजावत बहोत करताल॥२॥
कोउ गुडीगुडीसो उरझावत आवत खेंचत दोरिरसाल।
परमानंद स्वामी मनमोहन रीझ रहेत एकही ताल॥३॥

लाल कछु कीजे भोजन तिल तिल कारी हों वारी हों

लाल कछु कीजे भोजन तिल तिल कारी हों वारी हों।
अब जाय बैठो दोउ भैया नंदबाबा की थारी हो॥१॥
कहियत हे आज सक्रांति भलो दिन करि के सब भोग संवारी हो।
तिल ही के मोदक कीने अति कोमल मुदित कहत यशुमति महतारी॥२॥
सप्तधान को मिल्यो लाडिले पापर ओर तिलवरी न्यारी।
सरस मीठो नवनीत सद्य आज को तिल प्रकार कीने रुचिकारी॥३॥
बैठे श्याम जब जेमन लागे सखन संग दे दे तारी।
परमानंद दास तिहि औसर भरराखे यमुनोदक झारी॥४॥

मलार मठा खींच को लोंदा

मलार मठा खींच को लोंदा।
जेवत नंद अरु जसुमति प्यारो जिमावत निरखत कोदा॥
माखन वरा छाछ के लीजे खीचरी मिलाय संग भोजन कीजे॥
सखन सहित मिल जावो वन को पाछे खेल गेंद की कीजे॥
सूरदास अचवन बीरी ले पाछे खेलन को चित दीजे॥

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