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श्री यमुना जस जगत में जोइ गावे

श्री यमुना जस जगत में जोइ गावे ।
ताके अधीन ह्वै रहत हे प्राणपति
नैन अरु बेन में रस जु छावे ॥१॥

वेद पुराण की बात यह अगम हे,
प्रेम को भेद कोऊ न पावे ।
कहत गोविन्द श्री यमुने की जापर कृपा,
सोइ श्री वल्लभ कुल शरण आवे

तेसोई वृन्दावन तेसीये हरित

तेसोई वृन्दावन तेसीये हरित भूमि तेसीये वीरवधू चलत सुहाई माई ।
तेसेई कोकिला कल कुहू कुहू कूजत तेसेई नाचत मोर नयना सुखदाई ।। १ ।।

तेसी नवरंग नवरंग बनी जोरी तेसेई गावत राग मल्हार तान मन भाई ।
गोविंदप्रभु सुरंग हिंडोरें झूलें फूलें आछे रंगभरे चहुँदिशतें घटा जुरी आई ।। २ ।।

तुम देखो माई आज नैन भर हरि जू के रथ की सोभा

तुम देखो माई आज नैन भर हरि जू के रथ की सोभा।

प्रात समय मनो उदित भयो रवि निरखि नयन अति लोभा ॥१॥

मनिमय जटित साज सरस सब ध्वजा चमर चित चोबा।
मदनमोहन पिय मध्य बिराजत मनसिज मन के छोभा ॥२॥

चलत तुरंग चंचल भू उपर कहा कहूं यह ओभा ।
आनंद सिंधु मानों मकर क्रीडत मगन मुदित चित चोभा ॥३॥

यह बिध बनी बनी ब्रज बीथन महियां देत सकल आनंद ।
गोविन्द प्रभु पिय सदा बसो जिय वृंदावन के चद ॥४॥

श्री गोवर्धनराय लाला

श्री गोवर्धनराय लाला।
अहो प्यारे लाल तिहारे चंचल नयन विशाला॥

तिहारे उर सोहे वनमाला।
याते मोही सकल ब्रजबाला॥ ध्रु.॥

खेलत खेलत तहां गये जहां पनिहारिन की बाट।
गागर ढोरे सीस ते कोऊ भरन न पावत घाट ॥१॥

नंदराय के लाडिले बलि एसो खेल निवार।
मन में आनन्द भरि रह्यो मुख जोवत सकल ब्रजनार॥२॥

अरगजा कुमकुम घोरि के प्यारी लीनो कर लपटाय।
अचका अचका आय के भाजी गिरिधर गाल लगाय॥३॥

यह विधि होरी खेल ही ब्रजबासिन संग लाय।
गोवर्धनधर रूप पै ’जन गोविन्द’ बलि-बलि जाय॥४॥

आये आये हो मन भावन कहांते भोर

आये आये  हो  मन  भावन   कहांते   भोर   ही   भवन   हमारे |
तुम कियो रति सुख हम दियो   अतिदु:ख  सांचे  बोल  तिहारे || १  ||
तुम कियो मधुपान घूमत हमारो मन ऐसें कैसें बनै प्राण प्यारे |
अब तो सिधारो जहां रेन वसे  तहां  गोविन्द  प्रभु  पिय  हमारे || २  ||

अति सुंदर मनि जटित पालनों

अति सुंदर मनि,  जटित पालनों, झूलत लाल, बिहारी  ।
खेलत    फाग,   सखा   संग   लीने,   नाचत   दै  कर, तारी ।। १ ।।

घर    घर   तैं,   आई   बन   बन  कै,   पहिरैं  नौतन,   सारी ।
तनक    गुलाल,   अबीरन   लैकें,   छिरकत   राधा,   प्यारी ।। २ ।।

गावत   गारि,   आई   आंगनमें,   प्रमुदित   मन,   सुकुमारी ।
चोवा   चन्दन,    अगर   कुंमकुमा,     देत    सिस  तैं   ढोरी ।। ३ ।।

लपटी   रहे    तन,    बसन    रंगमें,   लागत   हैं,   सुखकारी ।
देखत   बिवस,  भये  मन मोहन,   भरी   लीनें   अंक,   वारी ।। ४ ।।

अरी वह नंद महर कौ छोहरा

अरी वह,नंद महर कौ छोहरा, बरज्यौं नहीं मानैं ।
प्रेम लपेटौ अटपटौ औरु मोहि  सुनावै दोहरा ।। १ ।।
                                                   बरज्यौं नहीं मानैं नंद महर कौ छोहरा,
कैसे कै जाऊं दुहावन गैया, आये अगोरे गोंहरा ।
नख-सिख रंग बोरै औ तोरै, मोरे गरे को डोहरा ।। २ ।। बरज्यौ...

गारी दै दै भाव जनावै, और उपजावै मोहरा ।
गोविन्द प्रभु बलवीर बिहारी प्यारी, राधा कौ मीत मनोहरा ।। ३ ।। बरज्यौ...

मेरे रामलला को सोहिलो सुन...

मेरे रामलला को   सोहिलो  सुन,   नाच्यो  सुर  नर  नारी हो ।
उमग उमग आनंद में  डोलें,   तन  मन  धन   सब  वारि  हो ।। १ ।।
गृह   गृह   तें सब   सजी   चले   हो,    अपनें  अपनें  टोल हो ।
देत   बधाई   रहसि   परस्पर,      गावत    मीठे    बोल    हो ।। २ ।।
मंगल     साज     संवार  कें हों,     हाथन     कंचनथार    हो  ।
मानों कमलन शशि चढ़ चले हो, राजा दशरथ के दरबार हो  ।। ३ ।।
अवधपुरी   अति   सोहिये  हो,   मंगलपुर हि   निशान    हो ।
मौतिनचौक    पुराय  कें  हो,   मंगल   विविध   विधान   हो ।। ४ ।।
देव  पितर   गुरु   पूजकें  हो,    जातकर्म    सब   कीने    हो ।
द्विजवर  कुल   सनमान   देकें,    दान  बहुविध   दीने   हो ।। ५ ।।
मागध   सूत    बिरदावली   हो,     सूरजवंश     बखान    हो ।
याचकजन    पूरण    किये   हो,    दानमान    परिधान   हो ।। ६ ।।
विधि   महेश   सुर   शारदा   हो,   देख   सिहात  समोद  हो ।
ध्यान धरे नहीं पाईयें हो,  सो  देखो  कौशल्या की  गोद  हो  ।। 7 ।।
विविध कुसुम बरखा भई  हो,    आनंद    प्रेम   प्रकाश   हो ।
रामलला  के   रूपपें    जन,    बलबल     गोविन्ददास    हो ।। ८ ।।

झूलत सुरंग हिंडोरें राधामोहन

झूलत सुरंग हिंडोरें राधामोहन ।
वरण वरण चूनरी पेहेरें, व्रजवधू चहूँ ओरें ।। 1 ।।
राग मल्हार अलापत सप्तसुरन, तीन ग्राम जोरें ।
मदनमोहनजूकी या छबि ऊपर, गोविंद बल तृण तोरें ।। 2 ।

५ - श्याम संग श्याम, बह रही श्री यमुने

श्याम संग श्याम, बह रही श्री यमुने ।
सुरत श्रम बिंदु तें, सिंधु सी बहि चली, मानो आतुर अलि रही न भवने ॥१॥
कोटि कामहि वारों, रूप नैनन निहारो, लाल गिरिधरन संग करत रमने ।
हरखि गोविन्द प्रभु, निरखि इनकी ओर मानों नव दुलहनीं आइ गवने ॥२॥

Shyamsang Shyam bahe Shri Yamune 
Surat shram bindute sindusi bahachali, mano aatur ali rahi na bavne.
Koti kaamhi varo, rup nein niharo, Lal Giridharan sang karat ramne,
Harki Govind Prabhu nirkhi inki aur, mano navdhulhanni  aayi gavne

६ - श्री यमुना सी नाही कोउ और दाता

श्री यमुना सी नाही कोउ और दाता ।
जो इनकी शरण जात है दौरि के, ताहि को तीहिं छिनु कर सनाथा ॥१॥
एहि गुन गान रसखान रसना एक सहस्त्र रसना क्यों न दइ विधाता ।
गोविन्द प्रभु तन मन धन वारने, सबहि को जीवन इनही के जु हाथा ॥२॥

Shri Yamunasi naahi koi aur data  
Jo inkisharan jaat hain dorike, tahiko tihi chin kar sanatha.
Yehi gun ghan raskhan rasna ek, sahastra rasna  kiyon a dehi Vidhata,
Govind Prabhu tan man dhan varne, sabhiko jivan  inhike ju haata.

७ - श्री यमुना जस जगत में जोइ गावे

श्री यमुना जस जगत में जोइ गावे ।
ताके अधीन ह्वै रहत हे प्राणपति नैन अरु बेन में रस जु छावे ॥१॥
वेद पुराण की बात यह अगम हे, प्रेम को भेद कोऊ न पावे ।
कहत गोविन्द श्री यमुने की जापर कृपा, सोइ श्री वल्लभ कुल शरण आवे


Shri Yamuna jas jagat mein joi gaave,   
Taake aadheen  bahe rahat he Pranpati, nein auroben mein ras ju chave.
Ved puran ki baat ye agam he premko bhedh koi na paveh, 
Kahat Govind Shri Yamune ki ja par kripa, sohi Shri Vallabh kul sharan aave.

८ - चरण पंकज रेणु श्री यमुने जु देनी

चरण पंकज रेणु श्री यमुने जु देनी ।
कलयुग जीव उद्धारण कारण, काटत पाप अब धार पेनी ॥१॥
प्राणपति प्राणसुत आये भक्तन हित, सकल सुख की तुम हो जु श्रेनी ।
गोविन्द प्रभु बिना रहत नहिं एक छिनु, अतिहि आतुर चंचल जु नैनी ॥२॥

Charanpankaj renu Shri Yamune ju deni 
Kalyug jeev udharan karan, katat paap ab dhar peni.
Pranpati pransut aaye bhaktan heet, sakalsukhki tum ho ju shreni,
Govind Prabhu bina rahat nahin ek chinu, atihi aatur chanchal ju nayni.

तुम देखो माई आज नैन भर हरि जू के रथ की सोभा

तुम देखो माई आज नैन भर हरि जू के रथ की सोभा।
प्रात समय मनो उदित भयो रवि निरखि नयन अति लोभा ॥१॥
मनिमय जटित साज सरस सब ध्वजा चमर चित चोबा।
मदनमोहन पिय मध्य बिराजत मनसिज मन के छोभा ॥२॥
चलत तुरंग चंचल भू उपर कहा कहूं यह ओभा ।
आनंद सिंधु मानों मकर क्रीडत मगन मुदित चित चोभा ॥३॥
यह बिध बनी बनी ब्रज बीथन महियां देत सकल आनंद ।
गोविन्द प्रभु पिय सदा बसो जिय वृंदावन के चद ॥४॥

श्री वल्लभ श्री वल्लभ श्री वल्लभ गुन गाऊँ

श्री वल्लभ श्री वल्लभ श्री वल्लभ गुन गाऊँ।
निरखत सुन्दर स्वरूप बरखत हरिरस अनूप द्विजवर कुल भूप सदा बल बल बल जाऊँ॥१॥
अगम निगन कहत जाहि सुरनर मुनि लहें न ताहि सकल कला गुन निधान पूरन उर लाऊँ।
गोविन्द प्रभु नन्दनन्दन श्री लछमन सुत जगत वंदन सुमिरत त्रयताप हरत चरन रेनु पाऊँ॥२॥

हों बलि जाऊं कलेऊ कीजे

हों बलि जाऊं कलेऊ कीजे।
खीर खांड घृत अति मीठो है अब को कोर बछ लीजे ॥१॥
बेनी बढे सुनो मनमोहन मेरो कह्यो जो पतीजे।
ओट्यो दूध सद्य धौरी की सात घूंट भरि पीजे ॥२॥
वारने जाऊं कमल मुख ऊपर अचरा प्रेम जल भीजे।
बहुर्यो जाइ खेलो जमुना तट गोविन्द संग करि लीजे ॥३॥

अधम उद्धारनी मैं जानी, श्री जमुना जी

अधम उद्धारनी मैं जानी, श्री जमुना जी।
गोधन संग स्यामघन सुन्दर तीर त्रिभंगी दानी॥१॥
गंगा चरन परस तें पावन हर सिर चिकुर समानी।
सात समुद्र भेद जम-भगिनी हरि नखसिख लपटानी॥२॥
रास रसिकमनि नृत्य परायन प्रेम पुंज ठकुरानी ।
आलिंगन चुंबन रस बिलसत कृष्ण पुलिन रजधानी ॥३॥
ग्रीष्म ऋतु सुख देति नाथ कों संग राधिका रानी।
गोविन्द प्रभु रवि तनया प्यारी भक्ति मुक्ति की खानी ॥४॥

लालन तहिं जाहु जाके रस लंपट अति

लालन तहिं जाहु जाके रस लंपट अति।
अति अलसाने नैन देखियत प्रगट करत प्यारी रति॥१॥
अधर दसन छत वसन पीक सह अरु कपोल श्रम बिंदु देखियति।
नख लेखनि तन लखी स्याम पट जय पताक रन जीतिय रतिपति॥२॥
कितव वाद तजो पिय हम सों जैसो तन स्याम तेसोई मन अति।
गोविन्द प्रभु पिय पाग संवरहु गिरत कुसुम सिर मालति ॥३॥

जानि पाये हो ललना

जानि पाये हो ललना ।
बलि बलि ब्रजनृप कुंवर जाके बिविसन सब निस जागे अब तहीं अनुसर॥१॥
अपनी प्यारी के रति चिन्ह हमहिं दिखावन आये देत लोंन दाधे पर।
गोविन्द प्रभु स्यामल तन तैसेई हो मन जनम हि ते जुवतिन प्रान हर ॥२॥

श्री वल्लभ चरण लग्यो चित मेरो

श्री वल्लभ चरण लग्यो चित मेरो ।
इन बिन और कछु नही भावे, इन चरनन को चेरो ॥१॥
इन छोड और जो ध्यावे सो मूरख घनेरो ।
गोविन्द दास यह निश्चय करि सोहि ज्ञान भलेरो ॥२॥

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