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શ્રીયમુનાજીનો ઉત્સવ

હમ લઈ શ્યામ શરણ યમુનાકી, તિહારે ચરણ મૈયા લાગો રી ધ્યાન ।

માતા તિહારી સંજ્યા તારન, પિતા તિહારે સૂરજ ભાનુ;

ધર્મરાય-સે બંધુ તિહારે, પતિ તિહારે શ્રીભગવાન ।।૧।।

ઊંચે નીચે પર્વત કહિયેં, પર્વતરાયે પાષાણ ।

સાત સમુદ્ર ભેદ કેં નિકસી, એસી હૈ શ્રીયમુનાજી બલવાન ।।૨।।

બ્રહ્મા જાકો ધ્યાન ધરત હૈ, પંડિત વાંચત વેદ પુરાન ।

જોગી જતિ સતી સંન્યાસી, મગ્ન ભયે તિહારે ગુણગાન ।।૩।।

જૈસે તુરંગ ચલત ધરણી પર, તૈસે ભવરા કરત ગુંજાર ।

‘સૂરશ્યામ’ આધીન તિહારે જય જનની મૈયા કરની કલ્યાન ।।૪।।

ભાવાર્થઃ

‘સૂરશ્યામ’ની છાપનાં પદ શ્રીપ્રભુએ સ્વયં રચ્યાં છે. શ્રીયમુનાજીની વધાઈનું આ પદ ‘સૂરશ્યામ’ની છાપનું છે.
અમે શ્યામસ્વરૂપા શ્રીયમુનાજીનું શરણ ગ્રહણ કર્યું છે. તેથી હે યમુને મૈયા! અમારું ધ્યાન તમારાં ચરણોમાં લાગેલું રહો. તમારાં માતા છે સંજ્ઞાદેવી, તમારા પિતા છે આધિદૈવિક સૂર્યદેવ. તમારા ભાઈ છે ધર્મરાજ શ્રીયમદેવ અને તમારા પતિ છે પ્રભુ પોતે. એવાં શ્રીયમુનાજી પર્વતરાય હિમાલયના પાષાણોમાંથી ઊછળતાં-કૂદતાં, સાત-સાત સમુદ્રોને ભેદીને આપ પૃથ્વી પર પધાર્યાં છો. બ્રહ્માજી પણ તમારું ધ્યાન ધરે છે. વેદ-પુરાણ ભણતા પંડિતો, યોગીઓ, જતિ અને સતી તથા સંન્યાસી સૌ તમારા ગુણગાનમાં મગ્ન છે. જેમ ધરતી પર રેવાલ ચાલે, અશ્વ ચાલે, તેમ આપ પધારી રહ્યાં છો. ભ્રમરો ગુંજારવ કરે છે, એવાં શ્રીયમુનાજી, શ્રીશ્યામસુંદરલાલ પણ આપને આધીન છે. હે શ્રીયમુને મૈયા, આપનો જય થાઓ, આપ સૌનું કલ્યાણ કરો.

मैया मोहि ऐसी दुल्हनि भावै

मैया मोहि ऐसी दुल्हनि भावै |
जैसी ये काहूकी डिठोनिया  रुनक  झुनक  घर   आवे || १ ||
करकर पाक रसाल रसोई अपने कर ले मोहि जिमावे |
कर अंचल  पट  ओट   बाबाको   ठाढ़ी   ब्यार   ढुरावे || २ ||
मोहि   उठाय   गोद   बैठारे   कर   मनुहार     मनावे |
अहो  मेरे  लाल   कहो   बावासों   तेरो   ब्याह  करावे || ३ ||
नंदराय   नंदरानी   हिलमिल    सुख   समुद्र    बढावे |
परमानन्द प्रभुकी  बातें  सुन   आनंद  उर न  समावे || ४ || 

जाको मन लाग्यो गोपालसों...

राजभोग हिलग के पद

जाको  मन   लाग्यौ  गोपालसों  ताहि   और  कैसे भावैरी |
लै कर  मीन  दूधमें  राखौ,  जल  बिनु  सचु  नहीं  पावैरी || १ ||
ज्यों   सूरा   रन  घूमि  चलत  हैं,  पीर  न काहू  जनावैरी |
ज्यों   गूंगौ गुर  खाय  रहेत  है,  मुख  न  स्वाद  बतावैरी || २ ||
जैसें  सरिता मिली  सिन्धुमें,  उलटि  प्रवाह   न   आवैरी |
तैसेइ  सूर कमल मुख निरखत चित ईत उत न डुलावैरी || ३ || 

कृष्ण नाम जबतें श्रवन...

राजभोग हिलग के पद

कृष्ण नाम जबतें श्रवन सुन्यौरी आली, भूलीरी भवन हों तो बावरी भाई री |
भरी भरी  आवे  नैन  चितहू   न  परे  चैन,  तन की  दसा कछु और भई री || १ ||
जेतेक नेंम धरम किनेरी में बहु विधि, अंग अंग  भई हों  तो  श्रवन  मई री |
नंददास जाको नाम श्रवन सुनत यह गति, माधुरी मूरत केधों कैसी दई री || २ ||

कृष्ण नाम जबतें श्रवण सुन्यौरी आली

कृष्ण नाम जबतें श्रवण सुन्यौरी आली, भूलीरी  भवन हों तो बावरी भई री |
भरि भरि आवे   नैन  चितहू  न  परे  चैन,   तनकी   दसा कछु  और भई री || १ ||
जेतेक नेंम धरम  किनेरी में बहु विधि, अंग अंग  भई हों  तो  श्रवन  मई री |
नंददास जाको नाम  श्रवन सुनत यह गति, माधुरी  मूरत केंधो कैसी दई री ||२||

मेरी अखियन के भूषन गिरिधारी

मेरी अखियन के भूषन गिरिधारी |
बलि बलि जाऊ  छबीली छबि पर, अति  आनंद सुखकारी || १  ||
परम    उदार चतुर चिंतामनि, दरस परस दुखहारी |
अतुल प्रताप तनिक तुलसीदल, मानत सेवा  भारी || २  ||
कहा बरनों गुनगाथ  नाथके,  श्री  विठ्ठल   ह्रदय   बिहारी |
छीतस्वामी गिरिधरन  बिसद  जस,   गावत  गोकुल नारी || ३ ||

व्रजमे बाजत बधाई...

श्री विठ्ठलनाथजी की वधाई 

व्रजमें बाजत आज बधाई |
प्रकट भये भूतल श्री विठ्ठल  गोकुल पति सुखदाई || १  ||
प्रफुल्लित भये सकल दैवीजन मनहु रंक निधि पाई |
भक्ति कल्पतरुकी सब  शाखा  नव अंकुरित   बनाई || २  ||
गृहगृह तोरण ध्वजा पताका मंगलचार   सुनाई |
सुनत श्रवण आनन्द भयो अति गिरिधर केलि कराइ || ३  ||

मेरो माई हरि नागर सों नेह

मेरो माई हरि नागर सों नेह |
जबते   द्रष्टि  परे  मनमोहन  तबते विसरयो गेह || १  ||
कोऊ   नींदों  कोऊ   वंदो   मो   मन   गयो   संदेह |
सरिता सिन्धु मिली परमानन्द भयो एकरस तेह || २  ||

चलरी सखी नंदगाम जाय वसिये

चलरी सखी नंदगाम जाय वसिये |
खिरक  खेलत  व्रजचंदसों हसिये || १  ||
वसें   बेठन   सबे सुख माई |
एक  कठिन   दू:ख  दूर कन्हाई || २  ||
माखन चोरे दूर दूर देखूं |
जीवन  जन्म  सुफल  कर   लेखुं || ३  ||
जलचर लोचन छिन छिन प्यासा |
 कठिन प्रीति परमानंददासा || ४  ||

ग्वालिनी आपतन देख मेरे

राजभोग उराहने के पद


ग्वालिनी आपतन देख मेरे, लाल तन देखरी, भीत ज्यों होय तो चित्र अब रेखरी || ध्रु  || 
मेरो    ललन   है    पांच    ही    बरसको,     रोय कें     अजहूँ     पयपान     माँगे |
तू  तो     अति    ढीठ,   जोवनमत्त   ग्वालिनी,  फिरत  इतरात,  गोपाल  आगें || १  ||
मेरे   ललन की,     तनक  सी   अंगुरी,     ये   बड़े   नखन  के,       चिन्ह      तेरें |
मष्ट   कर   हसेंगे,   लोग   अगवार को,   यह   भुजा  कहाँ   पाई,   स्याम    मेरे || २  ||
झुक वगईल ग्वालिनी, यनन हँसी नागरी, उराहने के  मिस,  अधिक  प्रीत  बाढी |
एक   सुन    सूर,   सर्वस्व     हरयो   सांवरे,   अनउत्तर   महरिके   द्वार   ठाढ़ी || ३  ||

ठाडो सुंदर सांवरो ढोटा

ठाडो  सुंदर  सांवरो   ढोटा,  कहियत   नन्द   किशोर  री |
थकित भई उनको मुख निरखत,  चाहि रही सुख और री || १  ||
भूली डगर बगर की सब सुधि, चितें  लियो  चित  चोर री |
हों   जमुना   जल  भरन  जात  हिं  आये  गागर  फ़ोर री || २  ||
लोक बेद की कानि  तजि  सब  जों  गुडिया  बस  डोर  री |
जाय मिलौं परमानंद  प्रभुसों,  तोरुं  ये लाज की  खोर री || ३  ||

श्यामसों नेह कबहू न कीजे

श्यामसों नेह कबहू न कीजे |
मन श्याम तन श्याम श्याम ही सलोने टेढ़ी प्रीत करे तन छीजे || १  ||
श्याम पाग सिर छबि सों  सांवरेकी आली सर्वस अपनों दीजे |
चतुर्भुज प्रभु गिरिधर सों हिलमिल अधर सुधारस पीजे || २  ||

मात जशोदा परव मनावे

मात   जशोदा  परव  मनावे |
भोगी के   दिन   तिल    लडुवा    ले    लालनकोंजू     जिमावे || १  ||
गोद  बेठाय   निहारत  सुत  मुख   नानाविध  के दान  दिवावे |
कुंभनदास प्रभु गोवरधनधर   निरख निरख सब ही सुख पावे || २  ||

मात जशोदा परव मनावे

मात   जशोदा  परव  मनावे |
भोगी के   दिन   तिल    लडुवा    ले    लालनकोंजू     जिमावे || १  ||
गोद  बेठाय   निहारत  सुत  मुख   नानाविध  के दान  दिवावे |
कुंभनदास प्रभु गोवरधनधर   निरख निरख सब ही सुख पावे || २  ||

बरसानै की नवल नारि मिली


बरसानै की   नवल   नारि  मिली   होरी  खेलनि   आंई   हो ।
बरबट धाई   जाई   जमुना   तट   घेरे   कुंवर   कन्हाई   हो ।। १  ।।
अति   झीनीं  केसरी   रंग   भीनीं    सारी  सुरँग  सुहाई  हो ।
कंचन  बरन  कंचुकी   ऊपर   झलकत   जोबन   झांई   हो ।। २  ।।
केसरी  कस्तूरी  मलयागिरि  भाजन  भरि  भरि   लाई  हो ।
अबीर गुलाल फेंटी भरि भामिनी करन कनक पिचकाई हो ।। ३  ।।
उत तैं गोप सखा सब  उमंगे   खेल   मच्यौं   उदमाई    हो ।
बाजत  ताल  मृदंग  झांझ  ढफ   मुरली  मधुर  सुनाई  हो ।। ४  ।।
खेलति खेलति रसिक सिरोमनि  राधा  निकट  बुलाई  हो ।
हृषिकेश  प्रभु  रिझि  स्याम  धन   बनमाला   पहिराई  हो ।। ५  ।।

दिनकर घर आनंद उदित बढ्यो अति...

यमुनाजी की वधाई

दिनकर घर आनंद उदित बढ्यो अति, चल सखी आज बधावें हो ।
प्रकट   भई   यमुना    जगतारण,    सब   मिल  मंगल  गावे  हो ।। १ ।।
धन्य   कूंख   संजारानी  की,      ऐसी     सुता     जो    जाई    हो ।
कृष्णप्रिय  पटरानी  जन्म सुन,     जित    तित बजत बधाई हो ।। २ ।।
चैत्रमास  शुभ   लग्न     मुहूरत,    छठ    गुरूवार    उजेरी      हो ।
जुरत    निशान    नाचत   नरनारी,      गावत   दे   दे   हेरी     हो ।। ३ ।।
घरघर   मंगल   मुदित   माननी,     मोतिन     चोक    पुरावे  हो ।
ध्वजा    पताका    कदली      रोपत,      वंदनवार      बंधावे    हो ।। ४ ।।
अधम   उद्धारन      कारन    भू  पर,    भाग्यन  दे    दरसाई   हो ।
महिमा   अपरम्पार    कहा    कहूं,      वेद     पुरानन    गाई   हो ।। ५ ।।
मज्जन  करत  हरत  अघ  ओघन,   भक्त  मुक्त  गति देनी हो ।
मानो विधि  द्वै  वैकुण्ठ  चढ़न कुं,  उभय तट रचि हे निश्रेनी हो ।। ६ ।।
शोभा     श्री     मथुरामंडल  की,    चरण    शरण  हूँ   ताकि   हो ।
माथुर    मणि   पोखत  तोखत  नित,   जिये   भरोंसे  जाकी  हो ।। ७ ।।
श्री विश्राम    निकट    वहेत    हे,      लागत    धार     सुहाई   हो ।
जाके   दरस   परस   यम   किंकर,    कबहूँ   न  देत दिखाई   हो ।। ८ ।।
कीजे   कृपा   निज   दास   जानके,   मन  वांछित  फल  पाई हो ।
इच्छाराम     मधुपुरी    वसकें,    जन्म    कर्म   गुण    गाई   हो ।। ९ ।।

प्रीति बँधी श्री वल्लभ पद सों, और न मन में आवै हो

प्रीति  बँधी  श्री वल्लभ  पद सों,  और  न   मन   में आवै हो ।
पढि  पुरान  खट-दर्शन  नीके,   जो   कछु   कोऊ  बतावै हो ।। १ ।।
जब तें अंगीकार कियौ मेरो,    तब   तें  अन्य  न सुहावै हो ।
पाई महारस  कौन  मूढ़ मति, जित तित चित भटकावै हो ।। २ ।।
जाके भाग  फलें  या   कलि में,   सरन  सोई  जन  पावै हो ।
नंदनंदन को निज सेवक करि,  दृढ़  करि   बांह   गहावै हो ।। ३ ।।
जिन कोऊ करो भूल मन संशय, निश्चें करि श्रुति गावै हो ।
'रसिक'  सदा   फलरूप  मानिकें,  लै   उछंग  हुलरावै   हो ।। ४ ।।

श्री वल्लभ तजि अपुनो ठाकुर

श्री   वल्लभ   तजि अपुनो ठाकुर,   कहो   कौनपें  जैये  हो ।
सब   गुन  पूरन  करुना  सागर,   जहाँ  महारस   पैये   हो ।। १ ।।
सुरत ही देख  अनंग विमोहित, तन मन  प्रान  बिकैये  हो ।
परम उदार चतुर सुख सागर,   अपार  सदा  गुन  गैये   हो ।। २ ।।
सबहिनतें अति उत्तम जानियें,  चरनन   प्रीति   बढेये हो ।
कान न काहू की मन धरिये,   व्रत   अनन्य एक ग्रहिये हो ।। ३ ।।  
सुमिर सुमिर गुन रूप अनुपम, भाव दु:ख सबें बिसरैये हो ।
मुख बिधु लावन्य अमृत इक टक, पीवत नाहिं अघइये हो ।। ४ ।।
चरन कमल की निसदिन  सेवा,   अपने  ह्रदय   बसैये  हो ।
'रसिक' कहै संगीन सों भवो-भव,   इनके   दास  कहैये हो ।। ५ ।।

श्री वल्लभलाल आंगन

श्री आचार्यजी की बाललीला के पद

श्री  वल्लभलाल  आंगन   मध्य  खेलन  ।
पहले   प्रगट   श्री    यशोदा नंदन   गोपीनकों   रस  देनन  ।। १ ।।
अब ही  प्रगट   श्री  लक्ष्मण नंदन   श्री भागवतरस एनन  ।
परमानन्द प्रभु की छबि निरखत सुख आवत नहीं बेनन  ।। २ ।।

इलम्मा श्री वल्लभ गोद खिलावत

श्री वल्लभाचार्यजी के बाल लीला के पद

इलम्मा श्री वल्लभ गोद खिलावत ।
गोद खिलावत  मन  हुलसावत   कर  गहि  चंद  दिखावत ।। १ ।।
रुनन झूनन  पग  पेंजनी  बाजत   लाल  घुटुरुवन  धावत ।
श्री लक्ष्मण भट निरख प्रफुल्लित सूर निरख जस गावत ।। २ ।।

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