लालन तहिं जाहु जाके रस लंपट अति

लालन तहिं जाहु जाके रस लंपट अति।
अति अलसाने नैन देखियत प्रगट करत प्यारी रति॥१॥
अधर दसन छत वसन पीक सह अरु कपोल श्रम बिंदु देखियति।
नख लेखनि तन लखी स्याम पट जय पताक रन जीतिय रतिपति॥२॥
कितव वाद तजो पिय हम सों जैसो तन स्याम तेसोई मन अति।
गोविन्द प्रभु पिय पाग संवरहु गिरत कुसुम सिर मालति ॥३॥

No comments:

Post a Comment

Featured Post

શ્રીકૃષ્ણ: શરણં મમ:

શ્રીકૃષ્ણ: શરણં મમ:… શ્રીકૃષ્ણ: શરણં મમ: શ્રીકૃષ્ણ: શરણં મમ:… શ્રીકૃષ્ણ: શરણં મમ: કદંબ કેરી ડાળો બોલે શ્રીકૃષ્ણ: શરણં મમ: જનુમા કેરી પ...